भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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तात्या के अधवृत्त को तोड़ने का बहुत प्रयास किया। पर तात्या की तोपों ने अंग्रेजों को आगे कदम रखना असंभव कर दिया। आगे कदम बढ़ाना तो दूर, अब मूल जगह पर भी अटल रहना असंभव देख अंग्रेज रण से पीछे हटने लगे। अंग्रेजों का बायां बाजू अपनी तोपें छोड़कर भी पीछे हटा। यह देखते ही उनके दाएं बाजू की सेना ने जोर लगाकर तोपों की रखा की। परंतु अब तो अंग्रेजी सेना के पैर रण से उखड़ गए। वे जैसे-जैसे पीछे हटते दिखे वैसे-वैसे विद्रोहियों का अर्धवृत्त उन्हें पीछे हटाता गया। शाम को छह बजे इस जंगी धकेला-धकेली में अंग्रेजी सेना पूरी तरह हार गई और उसका सेनापति जनरल विंडहम अपनी सेना के साथ अस्त-व्यस्त रीति से भागा। उसके हजारों तंबू, छोलदारियां, बैल, रसद और पोशाक विद्रोहियों के हाथ लगे। इस तरह उस जवां मई मराठे की तलवार को इस दूसरी विजय का मुकुट पहनाया गया। कल की लड़ाई में उसकी अप्रत्यक्ष जीत थी, पर आज तो उसकी प्रत्यक्ष परिपूर्ण विजय हुई। उसने अंग्रेजों के एक उत्तम सेनापति को दिन भर चले भयंकर रण में पराभूत ही नहीं किया, उसका पीछा भी किया। तंबुओं, छोलों के साथ उसकी छावनी गिराई और कानपुर शहर से उसे खदेड़कर उस शहर को जीता। यदि इस सेनापति जैसी ही उसकी सेना भी कर्तव्यनिष्ठ और संगठित होती तो अंग्रेजी इतिहासकार भी कहते हैं कि इस मराठे ने उस दिन जनरल विंडहम की सारी सेना काट डाली होती। इतना बढ़िया दांव तात्या टोपे ने जनरल विंडहम पर लगाया था। और तात्या के इस दांव की गूंज सर कोलिन को लखनऊ में सुनाई दी। जिस समय तात्या कानपुर आया, उसे यह आशा थी कि कोलिन को कम-से-कम एक माह लखनऊ उलझाए रहेगा और तब तक विंडहम के अकेलेपन का सहज ही लाभ लिया जा सकेगा। परंतु उसक यह दांव उसकी ओर से इतना विजयी हुआ, तभी उसको समाचार मिला कि लखनऊ का काम शीघ्र निपटाकर-वहाँ विद्रोहियों अधिक बाधा न होने से सर कोलिन भी कानपुर पर आक्रमण करता आ रहा है। अब गंगा के दोनों बाजुओं से अंग्रेजी सेना तात्या पर चढ़ आयी थी। लखनऊ में विद्रोहियों के ढीलेपन से अंग्रेजों के कमांडर-इन-चीफ से स्वयं कुश्ती लड़ने का बोझा क्रांतिवीरों के इस सेनानी पर आ पड़ा। फिर भी वह मराठा तारीख 27 को ब्रिदोहियों पर फिर से यथासंभव चढ़ाई करने या कम-से-कम उनकी चढ़ाई न होने देने का निश्चय कर प्रातः से ही लड़ाई चालू की। अंग्रेजों 1857 का स्वातंत्र्य समर – 311