भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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क्रांतिकारी कानपुर छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुए। उन्होंने उस शहर के पास ही अंग्रेजों के कमांडर-इन-चीफ से दो-दो हाथ करने का मन बनाया। क्योंकि-“ They had, as their leadr, a man of very great national abilities."137 इस कर्मठ सेनानी ने अपना बायां बाजू कानपुर और गंगा के बीच-अड़चनवाली जगह में, अपना मध्य कानपुर शहर में और अपना दायां बाजू गंगा नहर पर फैला रखा था। उसकी सेना में लश्करी शिखण प्राप्त करीब दस हजार सिपाही थे। उसने दिसंबर की 1 तारीख को अंग्रेजी सेना के कमांडर-इन-चीफ को चैन से नहीं बैठने दिया। दूसरे दिन तो उसी के तंबू पर विद्रोहियों ने यकायक गोलीबारी शुरू कर दी। 4 तारीख को उन्होंने कुछ ज्वालाग्रही नौकाएं अवध के पुल को जलाने के लिए गंगा के प्रवाह में छोड़ दीं। तारीख 5 को उनके तोपखाने ने अंग्रेजों की सारी सेना पर ऐसी गोलीबारी की कि सर कोलिन को अपना डेरा छोड़कर सेना की हलचल और अपना तोपखाना बहुत देर तक बंद करना पड़ा। विद्रोहियों की इस ढीठता से दी गई रण चुनौतियों को आज तक चुप होकर सुनने की बारी जो सर कोलिन पर आई थी वह 4 तारीख के बाद आनी नहीं थी। क्योंकि अब उसने अपनी सेना की उत्तम एकबद्धता कर रास्ते की सारी बाधाएं दूर कर दी थी और इसीलिए प्रत्यक्ष अंग्रेजी कमांडर-इन-चीफ के तंबू पर रोज-रोज गोलीबारी की गेंद का खेल खेलनेवाले जिद्दी, ढीठ और उद्दाम विद्रोहियों के पास कोई नौ-दस हजार सैनिक शिक्षा प्राप्त सिपाही थे और उनके बाएं बाजू में स्वयं नाना साहब, दाईं ओर ग्वालियर की सेना और उन सब पर तात्या टोपे सेनापति थे। अंग्रेजों के पास काली, गोरी कुल पांच हजार पैदल, छह सौ घुड़सवार और पैंतीस तोपें-ऐसे सब मिलाकर छह हजार लोगों की सज्जित सेना थी। चार्ल्स बाल कहता है-‘‘संख्या पचहत्तर हजार थी और उन सब पर स्वयं कमांडर-इन-चीफ सर कोलिन सेनापति था।‘‘ सर कोलिन ने विद्रोहियों के दाएं बाजू असुरक्षित जगह पडत्री हुई है, यह देखकर 6 दिसंबर को प्रातः नौ बजे लड़ाई शुरू की। दाईं ओर मुख्य हमला किया जाना है, यह बात छिपाने के लिए पहले बाएं बाजू पर अंग्रेजी तोपें गोला फेंकने लगीं। और इस कारण विद्रोहियो का ध्यान भी उधर ही गया। ग्रेट हेड ने विद्रोहियों के मध्य पर भी एक नकली हमला किया। इस तरह उधर गोलीबारी की भयानक उठा-पटक में वे धरती दहला रहे थे। तभी दाईं ओर छिपते-छिपाते अंग्रेजों ने विद्रोहियों पर बहुत जोर से वास्तविक हमला किया। जो सिख और गोरे लोग तीर की तरह चलते आ रहे थे उन पर ग्वालियर की सेना ने तोपों से भयानक गोलाबारी की। उसी तरह पांडे लोगों की सेना भी बंदूकों से आंग्ल सेना पर आग बरसाने लगी। सिख लोगों के डबल मार्च से दौड़ते ही विद्रोहियों से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 313 137 मैलसन, खंड 2, पृष्ठ 184 ।