१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसे कलकत्ता तक जो आंधी चली उसका हेतु इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि से अपनी सामर्थ्य भर कुछ खास चीजों को नष्ट कर देना है। दिल्ली पर डाले गए घेरे, कानपुर में हुए कत्ल, साम्राज्य के ऊंचे उठे ध्वज और उस ध्वज की छाया में लड़ते-लड़ते रणतीर्थ में शूरों द्वारा लगाई गई छलांगे जैसी उदात्त एवं स्फूर्तिजनक घटनाएं किसी एक अति उदात्त एवं स्फूर्तिजनक हेतु के बिना संभव थी क्या? कोई हर हफ्ते लगनेवाला बाजार भी अकारण नहीं लगता। फिर जिस बाजार का आयोजन करने की तैयारी वर्षों से चल रही थी, जिसकी दुकानें पेशावर से कलकत्ता तक के हर सिंहासन पर सजनेवाली थीं, जिसमें राज्य और साम्राज्य का लेन-देन चल रहा था और जहां रक्त और मांस के सिक्कों के सिवाय और किसी सिक्के की पूछ नहीं थी-वह बाजार क्या यों ही लगा और यों ही उठ गया? ऐसा नहीं हो सकता। ज्ञात होना बहुत कठिन है, इसलिए नहीं अपितु वह ज्ञात हुआ, यह मानना अपने हित में न होने के कारण इस मुद्दे की ओर अंग्रेज़ इतिहासकारों ने दुर्लक्ष्य किया है। परंतु इस दुर्लक्ष्य से भी अधिक उलझानेवाली और सन् 1857 के क्रांतियुद्ध के स्वरूप को सर्वाधिक भ्रष्ट करनेवाली दूसरी युक्ति या चूक विजातीय एवं उनकी धूल ओढ़नेवाले स्वजातीय इतिहासकारों ने जो की है, वह यह है कि इस सन् 1857 के प्रलय का कारण दूसरा कुछ नहीं, मुट्ठी भर लालची लोगों द्वारा उठाई गई कारतूसों की अफवाह है। अंग्रेज़ इतिहासकार और अंग्रेज़ों की कृपा पर पले-बढ़े एक देसी ग्रंथकार कहते हैं-कारतूसों में गाय और सूअर की चरबी लगाई जाती है, केवल इतना सुनकर ही मूर्ख लोग भड़क गए। सुनी हुई बात सच है या झूठ, इसकी खोज किसी ने नहीं की। एक ने कहा, इसलिए दूसरे ने कहा और दूसरा बिगड़ गया इसलिए तीसरा बिगड़ गया। ऐसी अंधपरंपरा चली जिससे अविवेकी मूर्खों का समाज जमा हुआ और विद्रोह हो गया। कारतूसों की बात पर लोगों ने अंधपरंपरा से विश्वास किया या क्या हुआ, इसका निर्णय आगे यथास्थान किया जाएगा, परंतु ये सच्चे या झूठे विश्वास विद्रोह की जड़ें थीं, यह विचार उत्पन्न करने का कैसा सुदीर्घ प्रयास चल रहा था, यह इससे स्पष्ट होता है। सन् 1857 जैसी प्रचंड क्रांति ऐसे कारणों से उत्पन्न होगी, यह कहनेवाले मंद या कुटिल बुद्धि के लोगों को क्रांति एक अविवेकी मूर्खों का समाज लगता है; लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि यदि सन् 1857 की क्रांति मुख्यतः कारतूसों के कारण ही प्रदीप्त हुई तो उसमें नाना साहब, दिल्ली का बादशाह, झांसी की रानी या रोहिलखंड का खान बहादूर कैसे सम्मिलित हुए? इनको अंग्रेजी सेना में नौकरी करनी नहीं थी या घर बैठे भी वह फौजी कारतूस तो तोड़ने ही होंगे, ऐसा आदेश भी किसी ने उन्हें नहीं दिया था। यदि यह विद्रोह केवल या मुख्य रूप से कारतूसों की चरबी से ही हुआ था तो हिंदुस्तान के अंग्रेज गवर्नर द्वारा उसे उपयोग में न लाने का आदेश देते ही उसे तुरंत ठंडा हो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 36