भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रकरण-9 विहंगावलोकन सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर की प्रमुख भूमिका उत्तरी हिंदुस्थान में ही निभाई गई थी, अतः इस प्रदेश में हुई अद्भुत उथल-पुथल का विस्तृत विवरण इस ग्रंथ में प्रस्तुत करना आवश्यक ही था। परंतु इस स्वातंत्र्य युद्ध को पूर्णतः समझने के लिए अन्य प्रदेशों में इन दिनों में हुई घटनाओं का उल्लेख करना भी अनिवार्य है। एतदर्थ इस रण-विस्फोट की प्रचंड ज्वालाओं को उत्तरी हिंदुस्थान के आकाश में किल्लोलें करते हुए छोड़कर अब हम अन्य प्रदेशों में इस विस्फोट से भड़की चिनगारियों पर भी दृष्टिपात करेंगे। दिल्ली के घेरे के दिनों में पंजाब प्रांत में चले घटनाचक्र का कुछ विवरण हमने उसी स्थान पर प्रस्तुत किया है। तदुपरांत वहां एक-दो सामान्य विद्रोही घटनाओं के अतिरिक्त प्रायः शांति ही रही। सिखों के अतिरिक्त यहां की अन्य जनता ने किसी भी ओर से इस युद्ध में भाग तो नहीं लिया, किंतु वे हृदय से इस बात के आकांक्षी थे कि क्रांति का यह यज्ञ सफलता प्राप्त करे । हां, सिख लोग और सिख संस्थान निश्चित रूप से ही अंग्रेजों के पक्ष में संघर्ष करते रहे। राजपूताना के जनसाधारण की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ ही थी। इस तथ्य की साक्षी भी अनेक प्रसंगों से प्रस्तुत हुई। जयपुर, जोधपुर और उदयपुर आदि के जो भारतीय सैनिक अंग्रेजों की ओर से संघर्ष करते थे, उन्हें अपशब्दों से संबोधित किया जाता था; किंतु ज्यों ही क्रांतिकारियों के कहीं विजयी होने का समाचार प्राप्त होता था, 1857 का स्वातंत्र्य समर - 383