१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसका। उत्तर में तो क्रांति की विद्युत ज्वाला अकल्पित गति से धधकी और इस संकल्प के साथ दहकी कि करेंगे अथवा मरेंगे। किंतु तत्काल ही विद्रोह करने के स्थान पर दक्षिणवाले उस विद्रोह के परिणाम की ओर ही दृष्टि गड़ाए शांत रहे। क्रांति के जोखिमक` समय में तो एक क्षण में जीवन-मरण का निर्णय हो जाता है। उतावलापन और विलंब-दोनों ही इसकी सफलता में बाधक सिद्ध होते हैं। दुविधा के इन क्षणों में क्षमतावान् पुरुष ऐसे मुहूर्त का चयन करते हैं जिनमें तेजी और धैर्य से अधिकाधिक लाभ की उपलब्धि हो। क्रांति का संचालन अंकगणित के नियमों के अनुसार नहीं होता। क्रांति की सफलता तो मानव के हृदय में विद्यमान अद्भुत आत्मिक सामर्थ्य पर ही अवलंबित होती है। अकर्मण्यता और मंदता से तो क्रांति को जाग्रत रखती है। संयम, दूरदर्शिता और विद्रोह की तिथि का निर्धारण करना आदि क्रांति की सिद्धता तक ही उपयोगी है। किंतु एक बार शंखनाद हुआ कि जीवन जाए अथवा रहे, इस ओर से निश्चित होकर ही क्रांति के रणांगण ममें जूझना पड़ता है। उस अवस्था में जो दुविधा में पड़ेगा उसकी पराजय सुनिश्चित है। उस निर्णायक घड़ी में जो इस चर्चा में उलझ जाएगा कि विद्रोह करना अच्छा है अथवा बुरा है, वह निश्चित रूप से ही अंततोगत्वा पराजित होगा। संगठन करते हुए शांति और क्रांति में धैर्य-ये ही सफलता की सीढ़ियां है। क्रांति का संगठन तो गलीची की बुनाई के समान सावधानी सहित धीरे-धीरे किया जाता अपेक्षित है। किंतु जब एक बार क्रांति का विस्फोट हो जाए तो क्षण मात्र के लिए भी असमंजस्यग्रस्त न होते हुए तीर के तुल्य उसमें प्रवेश करना चाहिए। फिर यश मिले अथवा अपयश, जीवित रहें अथवा मृत्यु का वरण करें, सब ओर से निश्चिंत होकर समरांगण मे जूझना ही श्रेयस्कर है। मारते-मारते मरने का अटल संकल्प ही ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि एक बार क्रांति का शंखनाद हो उठे तो क्रांति को यशस्वी करने के लिए एकमात्र मार्ग है-आगे बढ़ते जाना और अपने पग कदापि न रोकना। किंतु दक्षिण भारत ने इस तत्त्व को विस्मृत कर दिया और जब उत्तर में क्रांति की ज्वाला धधकी तो उसके साथ ही न उठकर खड़े होते हुए धीरे-धीरे सक्रिय रहे, किंतु असमंजसग्रस्त भी रहे। सफलता के प्रति अत्याधिक चिंता और उसके फलस्वरूप जोश में आकर अनुपम विद्रोह करने के कारण उन्हें अपयश कैसे प्राप्त हुआ, आइए, इस तथ्य पर भी दृष्टिपात करें। कोल्हापुर में 29वीं और धारवाड़ में 28वीं रेजीमेंट थी। जब पत्र-व्यवहार के माध्यम से क्रांति की योजना बनाई गई तो विद्रोह की तिथि 10 अगस्त, 1857 निर्धारित की गई। परंतु कोल्हापुर की जनता और सिपाहियों के दमन के लिए इसी बीच अंग्रेजों द्वारा एक गोरी सेना भेजने का निश्चय किया गया। यह समाचार तार विभाग के एक भारतीय कर्मचारी के माध्यम से भारतीय सिपाहियों को भी मिल गया? ज्यों ही यह गुप्त सूचना प्राप्त हुई तो पहले से ही दग्ध सिपाहियों ने 31 जुलाई को ही विद्रोह कर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 385