१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्या? मारो, वैसे ही मारते जाओ लातें! जल्दी ही तुम्हें कालिदास के शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेजः-इस वचन की सच्चाई ज्ञात होगी। हे विश्व! यह हमारा तपोधन हिंदुस्थान शम-प्रधान है, यह सच है; पर इसलिए तुम इसके इस शम-प्रधानत्व का अनुचित लाभ मत उठाना। क्योंकि इस तपोनिधि के शरीर में प्रदाहक, प्रचंड शक्तियां भी गूढ़ता से भरी हुई है। शंकर के तीसरे नेत्र की कथा क्या तुमने कभी सुनी है? वह नेत्र जब तक खुलता नही तब तक बहुत शांत रहता है। परंतु उसके खुलते ही पूरे विश्व को राख करने में सक्षम ज्वालाएं उसी में से निकलती हैं। तूने कभी ज्वालामुखी को देखा है। वह ज्वालामुखी ऊपर से हरा-भरा रहता है, पर यदि वह एक बार अपना जबड़ा खोलने लगे तो उसके उबलते अग्नि रस से दसों दिशाएं जलने लगती हैं। परंतु इस सामान्य ज्वालामुखी से भी जाज्वल्यतर यह हिंदुस्थान का जीवित ज्वालामुखी अब खौलने लग गया है। उसके उदर के भयंकर अग्नि रस में लहरें उठने लगी हैं। उसके दाहक द्रव्य एक-दूसरे में मिल रहे हैं और उनपर स्वातंत्र्य-प्रेम की चिंगारी गिर गई है। उसके मस्तक पर नाचनेवालो, एक क्षण और ˙˙˙˙कि दिग्गजों के कान भी बधिर हो जाएं, ऐसी गड़गड़ाहट होनेवाली है, फिर मदांध जुल्म को यह ज्ञात होगा कि हिंदुस्थान के ज्वालामुखी का प्रतिशोध कैसा होता है। 40 1857 का स्वातंत्र्य समर – 92 40 अंग्रेजों को हिंदुस्थान की मनोवृत्तियां इतनी ज्ञात थीं कि 87 की फरवरी में अंग्रेजी पत्र एवं अंग्रेजी सरकारी रिपोर्ट कहती है-“संपूर्ण देश पूर्णरूपेण शांत है।” –चार्ल्स बाल