१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपने बंधुओं को अपनी आंखों से सामने दंडित किया जाएगा, यह सुनकर भी शांत रहनेवाला बैरकपुर नहीं था। वहां स्वतंत्रता की ज्योति हर तलवार में चमकने लग गई थी। परंतु इन सबसे अधिक मंगल पांडे की तलवार म्यान में अधीर हो रही थी। 19वीं पलटन की तरह ही 34वीं पलटन को भी समय आते ही कंपनी की नौकरी को लात मारकर निकल जाने की इच्छा थी। इसलिए 19वीं पलटन को कंपनी अपने आप ही निकाल रही है, यह बहुत बढ़िया हो रहा है-ऐसा सारे स्वदेशाभिमानियों को लग रहा था। सब ओर का एकमत होने तक एक माह रूका जाए, ऐसा चतुर नेता कह रहे थे और सारे हिंदुस्थान में अलग-अलग पलटनों में कौन सा दिन निश्चित किया जाए, को धीरज कौन बंधाएं? मंगल पांडे ब्राह्मण कुल में जनमा और क्षात्रधर्म में दीक्षित हट्टा-कट्टा जवान था। स्वधर्म पर प्राणों से अधिक निष्ठा रखनेवाला, आचरण से सुशीलवान, स्वभाव से तेजस्वी और आयु से तरूण मंगल पांडे के पवित्र रक्त में देश - स्वातंत्र्य की विद्युत चेतना प्रवेश कर गई थी। फिर उसकी तलवार कैसे धीरज रखे? शहीदों की तलवार को कभी धैर्य रहता है क्या! जय-पराजय की रत्ती भर भी परवाह न करते हुए अपनी तत्त्वनिष्ठा पर जो स्वयं के रक्त का अभिषेक करते हैं, ऐसे ही लोगों के सिर पर बलिदानी मुकुट झिलमिलाता है और इस निष्फल-से लगते उष्ण रक्त से ही विजय की मूर्ति प्रकट हुआ करती है। अपने स्वदेश बंधुओं का अपनी आंखों के सामने अपमान हो, यह बात मंगल पांडे के अंतरतम को असह्य पीड़ा देने लगी और अपनी रेजिमेंट उसी दिन विद्रोह करे, वह ऐसा आग्रह करने लगा। गुप्त समिति के नेता आज विद्रोह करने को अनुमति नहीं दे रहे हैं, ऐसा ज्ञात होते ही उस जवान का साहस रुकना दुष्कर हो गया। उसने लपककर अपनी बंदूक उठाई और 'मर्द हो वो उठो', ऐसी गर्जना करते हुए परेड मैदान में कूद पड़ा। “अरे, अब पीछे क्यों रहते हो? भाइयों, आओ, टूट पड़ो। तुम्हें तुम्हारे धर्म की सौगंध है-चलो, अपनी स्वतंत्रता के लिए शत्रु पर टूट पड़ो।” ऐसी गर्जना करते हुए वह अपने स्वदेश बंधुओं को अपने पीछे आने का आह्वान करने लगा। यह देखते ही सार्जेंट मेजर ह्यूसन ने सिपाहियों को मंगल पांडे को पकड़ने का आदेश दिया। परंतु अंग्रेजों को आज तक मिले देशद्रोही सिपाही मंगल पांडे को पकड़ने नहीं हिला। और इधर मंगल पांडे की बंदूक से सन्-सन् करके निकली गोली ने उस ह्यूसन का शव तत्काल भूमि पर पटक दिया। यह गड़बड़ हो ही रही थी कि इतने में लेफ्टिनेंट बॉ भी वहां आ गया। इससे पहले कि उसका घोड़ा नाचते-नाचते आगे सरकता, मंगल पांडे की बंदूक से दूसरी गोली छूटी और वह उस घोड़े के पेट में घुसते ही घोड़ा लेफ्टिनेंट को लेकर धड़ाम से गिरा। मंगल पांडे को बंदूक भरने का अवसर मिले, इसके
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