भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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दासता की छूत लगी। दोड़ो सिपाहियों, उन दास्य चिन्हों को उन अंग्रेजी अधिकारियों के सामने फाड़कर और पैरों तले कुचलकर धूल में मिला दो। हजारों सिपाही उन दास्य-दूषित टोपियों को कुचलने लगे और बलहीन हुए अंग्रेज अधिकारी अपनी सत्ता का खुला अपमान करता यह भारतीय नृत्य देखते रहे।⁴⁴ उत्तर प्रदेश के उच्च पुरबिया ब्राह्मण कुल में जनमे मंगल पांडे का रक्त केवल बंगाल में ही स्वतंत्रता के बीज नहीं जमा रहा था, उधर अंबाला में भी उसकी विद्युत चेतना का संचार हो गया था। अंबाला में सिपाहियों ने एक नई पद्धति चालू की थी। वह था-यदि कोई अधिकारी उनके विरूद्ध जाए तो उसका घर-बार जलाकर भस्म कर डालना। रोज रात को देशद्रोहियों और विदेशियों के घर जलने लगे। यह काम इस झटके से और गुप्त ढंग से होता मानो प्रत्यक्ष अग्नि नारायण ही क्रांति पक्ष की गुप्त समिति का सदस्य बन गया है। बहुत आग गली और जो आग लगानेवाले को पकड़वा देगा, उसको हजारों रुपयों के इनाम भी घोषित किए गए। पर एक आदमी भी सूचना न देता। अंत में परेशान होकर स्वयं कमांडर-इन-चीफ ॲन्सन गवर्नर जनरल को लिखता है- “It is really strange that the incendiaries should never be detected. Everyone is on the alert here, but still there is no clue to trace the offenders.” फिर अप्रैल के अंत में वह लिखता है – “We have not been able to detect any of the incendiaries at Ambala. This appears to me extraordinary; but it shows how close the combinations among the conceive to be their wrongs and how great the dread of retaliation to any one who would dare to become an informer.” हिंदुस्थान के देशद्रोहियों पर तो अंग्रेजी साम्राज्य आधारित था! परंतु अंबाला में एक भी देशद्रोही न मिला। इससे स्वयं कमांडर-इन-चीफ गऊ बन गया और सिपाहियों के गुप्त षड्यंत्र की स्तुति करते हुए उनपर गुस्सा करता रहा तो इसमें आश्चर्य की बात क्या थी! अब यह आग हिंदुस्थान में जगह-जगह आरंभ हो गई थी। अंतिम विशाल आग भड़काने के पहले इधर-उधर छोटी-बड़ी गड़बड़ शुरू हो गई थी। अंबाला की भांति वहां भी अधिकारियों और देशद्रोहियों के घर सुलगने लगे थे। दिनांक 31 मई को सारा हिंदुस्थान एक साथ सुलगा दिया जाए, जिससे इधर-उधर जान छिपाने का अवसर न पाकर परतंत्रता अंदर-ही-अंदर राख हो जाएगी, यह निर्धारित योजना-लखनऊ की गुप्त समिति को यद्यपि मान्य थी, फिर भी वहां के तेजस्वी सिपाही बहादुरों को अपना गुस्सा दबाए रखना कठिन हो गया। उसमें भी हर रात की गुप्त सभाओं में चल रहे उद्दीपक भाषणों और जलनेवाले घरों के भयंकर दृश्यों से सिपाहियों को रुकना और अपने को रोकना कठिन 1857 का स्वातंत्र्य समर – 101 ⁴⁴ रेड पैफलेट, खंड 1, पृष्ठ 34।