भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पड़ता है। मृगयाबिहारी राजा दुष्यन्त के स्नेहवश पहाड़ी झरनों का कसैला और गर्म पानी पीना पड़ता है। असमय पर पका या कच्चा मांस का भोजन घोड़े हाथियों की आवाज से रात में नींद नहीं आती। इतने पर भी दुःख का अन्त नहीं, सुना है कि दुष्यन्त ने दुर्भाग्य से शकुन्तला नामक किसी सुन्दरी तापसकुमारी को देख लिया, उस पर आकृष्ट होकर वे अब नगर जाने की चर्चा ही नहीं करते। यह देखो, प्यारे मित्र हाथ में धनुष लिए जंगली फूलों की माला पहने इधर ही आ रहे हैं, अब अंग भङ्ग करके रहूँगा। इससे शायद छुटकारा मिल जाय। राजा से—हे मित्र ! मेरे हाथ-पैर नहीं चल रहे हैं। अतः केवल वाणी से ही जयजयकार करता हूँ—कहता है। राजा के हँसकर मित्र ! यह अंग जकड़ना कैसे हो गया ? यह पूछने पर विदूषक कहता है मित्र ! खुद आँख दुखाकर आँसू का कारण पूछते हो। अतः अब मुझे आखेट से विश्राम दो। इधर राजा भी शकुन्तला के रूप-लावण्यपर मुग्ध होकर आखेट से बचना ही चाहते थे। अतः वे सेनापति को आदेश देते हैं कि अब आखेट बन्द कर दिया जाय। आश्रम के यज्ञ में राक्षस उपद्रव करते हैं। तपस्वियों की प्रार्थना पर राजा यज्ञ-रक्षा के निमित्त वहाँ रुक जाते हैं। इसलिए प्रवृत्तपारण उपवास व्रत की समाप्ति पर माँ के बुलाने पर भी राजधानी न जाकर पुत्र के समान माने गये अपने मित्र विदूषक को ही सेना के साथ वापस भेज देते हैं। राजा को भय था कि कहीं यह बातूनी विदूषक शकुन्तला विषयक मेरे अनुराग को अन्तःपुर की रानियों से कह न दे। यह सोचकर राजा ने विदूषक से कहा—मित्र ! यहाँ मैंने तुम से पहले जो शकुन्तला की चर्चा की थी वह परिहास में की थी वास्तविक बात नहीं है ‘परिहास विजल्पितं सखे ! परमार्थेन न गृह्यतां वचः’। कहाँ मैं नागरिक वैदग्ध्य प्रिय व्यक्ति और कहाँ मृगों के बच्चों के साथ पली हुई भोली-भाली तपस्वियों की कन्यायें। भला हमारा इनका क्या जोड़ा ? यह तो एक विनोद मात्र (हँसी मजाक) था। इसमें सच्चाई कुछ भी नहीं है। मित्र माढव्य ! मेरे कथनानुसार तुम नगर में जाकर माँ के उपवास व्रत में पुत्र का कार्य सम्पादन करो और मैं भी तपोवन की रक्षा के निमित्त आश्रम जाता हूँ।

तृतीय अङ्क

हाथ में कुश लिए हुए यजमान का एक शिष्य कहता है, वाह, राजा दुष्यन्त के तपोवन में प्रवेश करने मात्र से ही सब यज्ञ कर्म सम्पन्न हो गये, क्योंकि इनके धनुष के टंकार से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं। इधर राजा दुष्यन्त यज्ञ-रक्षा कार्य से निवृत्त होकर मुनियों की अनुमति से मनोविनोदपूर्वक विश्राम करने के लिए मालिनी नदी के किनारे वैतस‌लता-मण्डप की ओर जाते हैं। वह कण्वपुत्री शकुन्तला का भी प्रिय स्थान है, जहाँ वह अपनी दोनों सखियों—प्रियम्बदा तथा अनसूया के साथ पहले से ही उपस्थित थी। राजा दुष्यन्त तथा शकुन्तला दोनों परस्परावलोकनजन्य कामपीड़ा से व्यथित होकर दुर्बल हो गये थे। सखियाँ शकुन्तला को रोगी समझकर नलिनीदल आदि से उपचार करती हुई रोग का कारण पूछती हैं। जब उन्हें मालूम होता है कि राजा दुष्यन्त से प्रेम करने के कारण इसकी यह दशा हुई है तब उन्होंने उसके उस कार्य का अनुमोदन किया और नलनीदल पर प्रेम-पत्र लिखवाती हैं। उस मदनलेख में शकुन्तला अपनी विरहव्यथा का वर्णन करती हुई कहती है कि सुभग ! आपका हाल तो मैं नहीं जानती, पर मैं रातदिन विरह की अग्नि में जलती जा रही हूँ। लताओं की ओट में छिपे हुए राजा दुष्यन्त यह सब सुनकर प्रकट हो जाने का उचित अवसर समझकर प्रकट हो जाते हैं।