भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः

**नटी—**अध कदमं उण उदुं अधिकरिअ गायिस्सम्। [ अथ कतमं पुनऋतुंम- धिकृत्य गास्यामि । ]

**सूत्रधारः—**नन्विममेव¹ तावदचिरप्रवृत्तमुपभोगक्षमं ग्रीष्मसमयमधिकृत्य² गीयताम्। संप्रति हि—

सुभगसलिलावगाहाः ³पाटलसंसर्गसुरभिवनवाताः।
प्रच्छायसुलभनिद्रा दिवसाः परिणामरमणीयाः ॥ ३ ॥


**नटी—**अथ = अधुना कतमं = कम्, ऋतुं = समयम्, अधिकृत्य = विषयीकृत्य गास्यामि = गायामि। वसन्तादीनां षण्णामृतूनां मध्ये कतममृतुमधिकृत्य मया गानमाच- रणीयमिति प्रश्नस्याशयः।

**सूत्रधारः—**इममेव अचिरप्रवृत्तं = इदानीमेव प्रादुर्भूतममुम्, उपभोगक्षमं = उपभोगाय • चन्दनाद्युपभोगाय क्षमं = समर्थं ग्रीष्मस्य समयं = कालम् अधिकृत्य विषयीकृत्य, गीय- ताम् = गानं क्रियताम्। साम्प्रतं = इदानीं ग्रीष्मे, हि = यस्मात्।

**अन्वयः—**दिवसाः सुभगसलिलावगाहाः पाटलसंसर्गसुरभिवनवाताः प्रच्छायसुलभ- निद्राः परिणामरमणीयाः।

सुभग इति। दिवसाः = दिनानि सुभगसलिलावगाहाः—सुभगः = ग्रीष्मसन्तापनिवर्त- कत्वेन मनोहरः सलिले = जले अवगाहः = स्नानं जलक्रीडा येषु ते सुभगसलिलावगाहाः पाटलस्य = पाटलिपुष्पस्य संसर्गेण = सम्बन्धेन सुरभयः सुगन्धपूर्णाः वनस्य विपिनस्य वाता वायवः येषु ते पाटलसंसर्गसुरभिवनवाताः प्रच्छायसुलभनिद्राः प्रकृष्टा छाया येषु ते प्रच्छायाः प्रच्छायाेषु घनच्छायायुक्तेषु स्थानेषु सुलभा सुखप्राप्या निद्रा येषु ते प्रच्छाय- सुलभनिद्राः परिणामरमणीयाः—परिणामे = अन्ते, दिवसावसाने सायंकाले रमणीयाः =


**नटी—**तो किस ऋतु के अनुरूप गीत गाऊँ !

**विशेष—**नाटक में कथोपकथन की शृङ्खला स्थिर रखने तथा वक्ता के वक्तव्य को बोझिल न होने देने के निमित्त छोटे-छोटे वाक्यों में बातें कही गयी हैं। नटी अपने मनसे गीत भी नहीं चुन रही है, क्योंकि सूत्रधार की इच्छा के अनुसार ही सब कार्य होने चाहिए।

**सूत्रधार—**प्रिये ! अभी थोड़े ही समय से प्रवृत्त हुए उपभोग क्षम इस ग्रीष्म ऋतु के प्रसंग में तुम कोई गीत गाओ, क्योंकि ग्रीष्म काल बड़ा ही सुहावना होता है। इस समय तो—

सुन्दर-सुन्दर जलाशयों में स्नान एवं जलक्रीड़ा करने में बड़ा ही आनन्द आता है। वन एवं उपवनों में गुलाब आदि अच्छे-अच्छे फूलों के संसर्ग से सुरभित पवन बहता है। और दोपहर के समय कुञ्जों की ठण्डी ठण्डी छाया में नींद भी अच्छी लगती है ॥ ३ ॥

**विशेष—**ग्रीष्म ऋतु के समय स्नान, जल क्रीड़ा, सुरभित वायु दोपहर के समय शीतल छाया में आई नींद और सन्ध्याकाल की रमणीयता का विशेष महत्व है। इस पद्य में इन सभी का एक ही साथ वर्णन कर कवि ने एक उत्तम भाव व्यक्त किया है।

इससे प्रतीत होता है कि नाटक का अभिनय गर्मी में हुआ था। गर्मी में प्रकृति का सेवन पूर्ण- रूप से होता है। लोग सुबह साम शीतल हवा का सेवन करते हैं। नदियों में तैरते हैं, चाँदनी रातों में भ्रमणकर आनन्द लूटते हैं इस प्रकार प्रत्येक ऋतु का अपना-अपना विशेष महत्व होता है।


पाठा०—१. तमिममेव। २. आश्रित्य। ३. पाटलि।