अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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सुन्दर आचरणयुक्त वासुदेवपरायणको उत्पन्न किया । जो शुभलक्षणसे सम्पन्न पौरुओंमें चक्रादि अंकित श्रेष्ठ था ॥ १७ ॥ पुत्रको उत्पन्न हुआ देखकर राजाने सम्पूर्ण क्रिया की और लोकमें अम्बरीष नामसे वह विख्यात हुआ ॥ १८
पितर्युपरते श्रीमानभिषिक्तोमहात्मभिः । मंत्रिष्वाधाय राज्यं च तप उग्रं चकार सः ॥ १९ ॥ संवत्सर सहस्रं वै जगन्नारायणं प्रभुम् । हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं सूर्यमण्डलमध्यगम् ॥ २० ॥
पिताके उपराम होनेमें उसका राज्याभिषेक हुआ, तब अम्बरीषने मन्त्रीजनोंको राज्य सौंपकर वनमें जाकर तप किया ॥ १९ ॥ सहस्रसंवत्सरतक नारायणका जप किया, हृदयकमलके मध्यमें तथा सूर्यमें नारायणका जप करते हुए ॥ २० ॥
शंखचक्रगदापद्मं धारयंतं चतुर्भुजम् । शुद्धजाम्बूनदनिभं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ॥ २१ ॥ सर्वाभरणसंयुक्तं पीताम्बरधरं प्रभुम्। श्रीवत्सवक्षसं देवं पुरुषं पुरुषोत्तमम् ॥ २२ ॥
तब शंख चक्र गदा पद्म धारण करनेवाले चतुर्भुज शुद्ध सुवर्णके समान कान्तिमान् ब्रह्मा विष्णु शिवात्मकरूप ॥ २१ ॥ सम्पूर्ण आभरणोंसे युक्त पीतांबरधारी प्रभु श्रीवत्स वक्षस्थलमें धारण किये पुरुषोत्तम देव ॥ २२ ॥
ततो गरुडमारुह्य सर्वदेवैरभिष्टुतः । आजगाम स विश्वात्मा सर्वलोकनमसकृतः ॥ २३ ॥ ऐरावतमिवार्चित्ये कृत्वा वै गरुडं हरिः । स्वयं शक्र इवासीनस्तमाह नृपसत्तमम् ॥ २४ ॥
गरुडपर चढे देवर्षियोंसे स्तुतिको प्राप्त सब लोकोंसे नमस्कारको प्राप्त हुए नारायण आये ॥ २३ ॥ और गरुडको अचिन्त्य ऐरावतके समान करके और इन्द्रका रूप स्वयं धारण कर उसके निकट आकर यह कहने लगे ॥ २४ ॥
इंद्रोऽहमस्मि भद्रं ते किं ददामि तवाद्य वै । सर्वलोकेश्वरोऽहं त्वां रक्षितुं समुपागतः ॥ २५ ॥ अम्बरीषस्तु तं दृष्ट्वा शक्रमैरावतस्थितम् । उवाच वचनं धीमान्विष्णुभक्तिपरायणः ॥ २६ ॥
हे राजन् ! मैं इन्द्र हूं तुम्हारा मंगल हो तुम्हारे निमित्त मैं क्या वस्तु दूं मैं सर्वलोकेश्वर तुम्हारी रक्षा करनेको आया हूं ॥ २५ ॥ अम्बरीष राजा ऐरावतपर स्थित हुए इन्द्रको देखकर विष्णुभक्तिमें परायण इस प्रकारके वचन कहने लगे ॥ २६ ॥