अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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हे गोविन्द मैं आपकी शरण हूँ; आप मेरी रक्षा कीजिये, आपके सिवाय मेरी अन्यगति नहीं है मैं आपकी शरण हूँ ॥ ३५ ॥ तब भगवान् विष्णुने कहा तुम्हारी क्या इच्छा है ? वह मैं सब तुम्हें दूंगा कारण कि, तुम मेरे भक्त हो ॥ ३६ ॥
भक्तप्रियोऽस्मि सततं तस्माद्दातुमिहागतः । अंबरीषस्तु तच्छ्रुत्वा हर्षगद्गदयागिरा ॥ ३७॥ प्रोवाच परमात्मानं नारायणमनामयम् । त्वयि विष्णौ परानंदे नित्यं मे वर्त्ततां मतिः ॥ ३८ ॥
मैं निरन्तर भक्तप्रिय हूँ इस कारण तुमको यथेच्छ फल देनेको आया हूँ, तुम मेरे भवत हो, यह वचन सुन अम्बरीष हर्षसे गद्गद हो ॥ ३७ ॥ परमात्मा अनामय नारायणसे कहने लगे हे विष्णो ! आपमें निरन्तर मेरी भक्ति हो । ३८ ।
भवेयं त्वत्परो नित्यं वाङ्मनः कायकर्मभिः । पालयिष्यामि पृथिवीं कृत्वा वै वैष्णवं जगत् ॥ ३९ ॥ यज्ञहोमार्चनैश्चैव तर्पिष्यामि सुरोत्तमान् । वैष्णवान्पालयिष्यामि हनिष्यामि च शात्रवान् ॥ ४० ॥
मन वचन कर्मसे नित्य मैं आपकी सेवा करके पृथिवीको विष्णुभक्त करदूंगा ॥ ३९ ॥ यज्ञ होम अर्चनसे देवताओंको तृप्त कर वैष्णवोंको पालकर असुरोंको नष्ट करूंगा ॥ ४० ॥
एवमुक्तस्तु भगवान्प्रत्युवाच नृपोत्तमम् । एवमस्तु तवेच्छा वै चक्रमेतत्सुदर्शनम् ॥४१॥ पुरारुद्रप्रभावेण लब्धं वै दुर्लभं मया । ऋषिशापादिकं दुःखं शत्रुरोगादिकं तथा ॥ ४२ ॥
यह सुनकर भगवान्ने राजासे कहा, जो तुम्हारी इच्छा है वह होगा और यह सुदर्शन चक्र ॥ ४१ ॥ जो प्रथम हमने रुद्रके प्रभावसे प्राप्त किया है यह ऋषिके शाप, दुःख, शत्रु, रोगादि ॥ ४२ ॥
निहनिष्यति ते दुःखमित्युक्त्वांतरधीयत । ततः प्रणम्य मुदितो राजा नारायणं प्रभुम् ॥ ४३ ॥ प्रविश्य नगरीं दिव्यामयोध्यां पर्यपालयत् । ब्राह्मणादींस्तथा वर्णान्स्वेस्वे कर्मण्ययोजयत् ॥ ४४ ॥
आपके दुःख दूर करेगा ऐसा कहकर अन्तर्धान होगये, तब प्रसन्न हो राजा नारायण प्रभुको प्रणाम कर ॥ ४३ ॥ दिव्य अयोध्या नगरीमें प्रवेश करके उसकी पालना करने लगा ब्राह्मणादि वर्णोंको भी अपने २ कर्ममें लगाता हुआ ॥ ४४ ॥