भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२१)

कन्यासिद्धि्रहो प्राप्तस्त्यावयोरिति वेगितौ। लोकालोकतमर्निशं भावमानौ तमोऽर्दितौ ॥ ५१ ॥ त्राहि त्राहीति गोविंदं भाषमाणौ भयार्दितौ । विष्णुलोकं ततो गत्वा नारायण जगत्पते ॥ ५२ ॥ बोले अहो ! कन्याकी यह सिद्धि हमको प्राप्त हुई, इस प्रकार दिनरात लोकालोक पर्वतके प्रति धावमान हुए ॥ ५१ ॥और भयसे कहने लगे हे गोविन्द ! हमारी रक्षा करो ! इस प्रकार जगत्पति नारायण विष्णुके पास जाकर ॥५२ ॥

वासुदेव हृषीकेश पद्म नाभ जनार्दन । त्राह्यावां पुण्डरीकाक्ष नाथोऽसि पुरुषोत्तम ॥ ५३ ॥ इत्यूचतुर्वासुदेवं मुनी नारदपर्वतौ। ततो नारायणोऽचिन्त्यः श्रीमाञ्छीवत्सलांछनः ॥ ५४ ॥ हे जगत्पते ! हे वासुदेव, हृषीकेश, पद्मनाभ, जनार्दन, पुण्डरीकाक्ष, नाथ पुरुषोत्तम ! आप हमारी रक्षा करो ॥ ५३ ॥ नारद और पर्वत मुनि इस प्रकार वासुदेवसे कहने लगे तब अचिन्त्य नारायण श्रीमान् भक्तवत्सल ॥५४॥

निवार्य चक्रं ध्वांतं च भक्तानुग्रहकाम्यया । अंबरीषश्च मद्भू- *क्तस्तत्थेमौ मुनिसत्तमौ ॥ ५५ ॥ अनयोर्नृपस्य च तथा हितं कार्य मया पुनः । आहूय तौ ततः श्रीमान्गिरा प्रह्लादयन्हरिः५६ भक्तोंके ऊपर अनुग्रहकी इच्छासे चक्रको निवारण कर बोले जैसे तुम मेरे भक्त हो इसी प्रकार वह राजा मेरा भक्त है ॥ ५५ ॥ इन दोनोंका तथा राजाका भी हित मुझको करना है तब भगवान्ने उनको बुलाकर वाणीसे प्रसन्न करते हुए ॥ ५६ ॥

उवाच भगवान्विष्णुः श्रूयतामिति मे वचः । क्षमेतां मुनिशा- र्दूलौ भक्तसंरक्षणाय मे ॥ ५७ ॥ अपराधं च चक्रेण क्षमाशीला हि साधवः । ततस्तौ मुनिशार्दूलौ मायां तस्यावबुध्य च ॥५८॥ कहा आप दोनों हमारे वचन सुनिये हे मुनिश्रेष्ठो भक्तरक्षाके निमित्त जो कुछ कहा है वह क्षमा करिये ॥ ५७ ॥ यह चक्रका अपराध है साधु क्षमा- शील होते हैं सो आप क्षमा करिये तब वे दोनों मुनि उसकी मायाको जान- कर ॥ ५८ ॥


* इति विचार्यति शेषः ।