अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(४६) अद्भुतरामायण [सप्तम-]
वारुणं याम्यमाग्नेयमैन्द्रं कौबेरमेव च ॥ वायव्यं च तथैशानं संशंश प्राप्य धर्मवित् ॥ ३७ ॥ गायमानो हरिं सम्यग्वीणा वादविचक्षणः ॥ गंधर्वाप्सरसां संघैः पूज्यमानस्ततस्ततः ॥ ३८ ॥ ब्रह्मलोकं समासाद्य कस्मिंश्चित्कालपर्यये ॥ हाहा हूहूश्च गंधर्वो गीतवाद्यविशारदौ ॥ ३९ ॥ ब्रह्मणो गायकौ दिव्यौ नित्यं गंधर्वसत्तमौ ॥ तत्र ताभ्यां समासाद्य गायमानो हरिं विभुम् ॥ ४० ॥
वरुण यम अग्नि इन्द्र कुबेर वायु तथा शान दिशामें यह धर्मात्मा संदेहको प्राप्त हो ॥ ३७ ॥ वीणा बजाकर नारायणके गुणानुवाद गाते यक्ष और गंधर्व अप्सराओंसे पूजित होने लगे ॥ ३८ ॥ ब्रह्मलोकको प्राप्त हो कुछ दिन उपरान्त वहां जो गीतवाद्यमें विशारद हाहा हूहूनामक गन्धर्व थे ॥ ३९ ॥ अर्थात् गंधर्व नित्य ब्रह्माजीके गान करनेवाले हैं उनके साथ मिलकर नारायणके निमित्त गान करते हुए ॥ ४० ॥
ब्रह्मणा च महातेजाः पूजितो मुनिसत्तमः ॥ तं प्रणम्य महात्मानं सर्वलोकपितामहम् ॥ ४१ ॥ चचार च यथाकामं सर्वलोकेषु नारदः ॥ पुनः कालेन महता गृहं प्राप्य च तुम्बुरोः ॥ ४२ ॥
और महातेजस्वी ब्रह्माजीसे पूजित होकर उन सर्वलोकके पितामह ब्रह्माजीको प्रणाम कर ॥ ४१ ॥ सब लोकमें यथेच्छ विचरण करने लगे बहुत कालके उपरान्त तुम्बुरुके घरमें प्राप्त हो ॥ ४२ ॥
वीणामादाय तत्रस्थस्तत्रस्थैरप्यलक्षितः ॥ सुरकन्याश्च तत्रस्थाः षड्जाद्याः सहधैवताः ॥ ४३ ॥ व्रीडितो भगवान्दृष्ट्वा निर्गतश्च स सत्वरम् ॥ शिक्षयामास बहुशस्तत्र तत्र महामुनिः ॥ ४४ ॥
अन्योंसे अलक्षित हो वीणा लेकर चले वहां वह षड्ज धैवत आदि देवकन्या स्थित थीं ॥ ४३ ॥ उनको देखकर लज्जित हो नारदजी वहांसे चले गये और जहां तहां मुनिने बहुत शिक्षा दी ॥ ४४ ॥
कालेऽतीते ततो विष्णुरवतीर्णो जगन्मयः ॥ देवक्यां वसुदेवस्य यादवोऽसौ महाद्युतिः ॥ ४५ ॥ सप्तस्वराङ्गना द्रष्टुं गानविद्याविशारदः ॥ ययौ रैवतके कृष्ण प्रणिपत्य महामुनिः¹ ॥ ४६ ॥
¹ नारदः