भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(६४) अद्भुतरामायण एकादश-

कार्य्ये ह्यस्य भवेदेषा पुण्यापुण्यमिति श्रुतिः । तद्वशादेव सर्वेषां सर्वदेहसमुद्भवः ॥ २३ ॥ नित्यः सर्वत्रगो ह्यात्मा कूटस्थो दोषवर्जितः । एकः स भिद्यते शक्त्या मायया न स्वभावतः ॥ २४ ॥

इसी कार्यमें यह पुण्य अपुण्य देखा जाता है ऐसी श्रुति है, इसीके वशसे सब देहधारियोंके देहकी उत्पत्ति है ॥ २३ ॥ आत्मा नित्य और सर्वत्रगामी है, कूटस्थ दोषसे वर्जित एकही वह अपने मायास्वभावसे अनेक प्रकारका दीखता है ॥ २४ ॥

तस्मादद्वैतमेवाहुर्मुनयः परमार्थतः । भेदोऽव्यक्तस्वभावेन सा च मायात्मसंश्रया ॥ २५ ॥ यथा हि धूमसंपर्कान्नाकाशो मलिनो भवेत् । अंतःकरणजैर्भावैरात्मा तद्वन्नलिप्यते ॥ २६ ॥

इस कारणसे मुनिजन परमार्थसे अद्वैतही कहते हैं, स्वभावसे जो अव्यक्तका भेद है वह माया है ॥ २५ ॥ जैसे धूमके सम्पर्कसे आकाशमें श्यामता दीखती है, आकाशमें दोष नहीं आता इसी प्रकार अन्तःकरणके भावोंमें आत्मा मलिन नहीं होता है ॥ २६ ॥

यथा स्वप्रभया भाति केवलः स्फटिकोपलः । उपाधिहीनो विमलस्तथैवात्मा प्रकाशते ॥ २७ ॥ ज्ञानस्वरूपमेवाहुर्जगदेतद्विचक्षणाः । अर्थस्वरूपमेवाज्ञाः पश्यन्त्यन्ये कुबुद्धयः ॥ २८ ॥

जैसे स्फटिक मणी केवल अपनी कांतिसेही शोभाको प्राप्त होती है उपाधिहीन होनेसे निर्मल है उसी प्रकार आत्मा प्रकाशित होता है ॥ २७ ॥ बुद्धिमान् इस जगत्‌को ज्ञानरूप कहते हैं, कुबुद्धि अज्ञानी इसको अर्थस्वरूप देखते हैं ॥ २८ ॥

कूटस्थो निर्गुणो व्यापी चैतन्यात्मा स्वभावतः । दृश्यते ह्यर्थरूपेण पुरुषैर्भ्रान्तदृष्टिभिः ॥ २९ ॥ यथा संलक्ष्यते व्यक्तः केवलः स्फटिको जनैः । रक्तिकाव्यवधानेन तद्वत्परम पूरुषः ॥ ३० ॥

वह कूटस्थ निर्गुण व्यापी आत्मा स्वभावसे चैतन्य है, भ्रांति दृष्टिवाले पुरुषोंको यह अर्थरूप दीखता है ॥ २९ ॥ जैसे मनुष्योंको केवल स्फटिक प्रत्यक्ष दीखता है और व्यवधानसहित होनेसे लालिमा आदि दीखती है इसी प्रकार परम पुरुष है पृथक् शुद्ध है देहमें व्याप्त होनेसे उपाधिमान् दीखता है ॥ ३० ॥