अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 73, कुल 173 में से
संदर्भ में पढ़ें(६६) अद्भुतरामायण [एकादश-
जैसे नदी नद समुद्रमें जाकर एकताको प्राप्त होते हैं इसी प्रकारसे यह निष्कल आत्मा अक्षरमें मिलकर एकताको प्राप्त होता है ॥ ३९ ॥ इस प्रकारसे विज्ञानही है प्रपंच और स्थिति नहीं है, लोक अज्ञानसे व्याकुल होकर विज्ञानसे देखता है ॥ ४० ॥
तज्ज्ञानं निर्मलं सूक्ष्मं निर्विकल्पं यदव्ययम् ॥ अज्ञानमिति तत्सर्वं विज्ञानमिति मे मतम् ॥ ४१ ॥ एतत्ते परमं सांख्यं भाषितं ज्ञानमुत्तमम् । सर्ववेदान्तसारं हि योगस्तत्रैक चित्तता ॥ ४२ ॥
वह ज्ञान निर्मल सूक्ष्म निर्विकल्प अविनाशी है, यह अज्ञानसे सब होता है विज्ञान है वही सर्व श्रेष्ठ है एक यही निश्चय है ॥ ४१ ॥ यह परम सांख्य उत्तम ज्ञान है, सब वेदान्तका सारयोग वही है कि एकचित्तता होनी ॥ ४२ ॥
योगात्संजायते ज्ञानं ज्ञानाद्योगः प्रजायते । योगज्ञानाभियुक्तस्य नावाप्यं विद्यते क्वचित् ॥ ४३ ॥ यदेव योगिनो यांति सांख्यं तदभिगम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स तत्त्ववित् ॥ ४४ ॥
योगसे ज्ञान होता है ज्ञानसे योग प्रवृत्त होता है, ज्ञानयोगसे युक्त पुरुषोंको कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ४३ ॥ जिस मार्गसे योगी चलते हैं उसी मार्गसे सांख्यवाले जाते हैं, सांख्य योगसे जो एकता देखता है वही देखता है ॥ ४४ ॥
अन्ये च योगिनो वत्स ऐश्वर्यासक्तचेतसः । मज्जन्ति तत्र तत्रैव सत्त्वात्मैक्यमिति श्रुतिः ॥ ४५ ॥ यत्तत्सर्वगतं दिव्यमैश्वर्यमचलं महत् । ज्ञानयोगाभियुक्तस्तु देहांते तदवाप्नुयात् ॥ ४६ ॥
हे वत्स ! ऐश्वर्यमें मन लगानेवाले योगी और हैं वे उन स्थानों में निमज्जित होते हैं, सत्त्वात्मा एक है यह श्रुति है ॥ ४५ ॥ जो सर्वगत दिव्य अचल ऐश्वर्य है ज्ञानयोगमें युक्त प्राणी उस सबको देहान्तमें प्राप्त हो जाते हैं ॥ ४६ ॥
एष आत्माहमव्यक्तो मायावी परमेश्वरः । कीर्तितः सर्ववेदेषु सर्वात्मा सर्वतोमुखः ॥ ४७ ॥ सर्वकामः सर्वरसः सर्वगंधोऽजरोमरः । सर्वतः पाणिपादोऽहमंतर्यामी सनातनः ॥ ४८ ॥
यह मैं अव्यक्त आत्मा मानवी परमेश्वर हूँ सब वेदोंमें सर्वात्मा सर्वतोमुख स्थित हो रहा हूँ ॥ ४७ ॥ सर्वकामयुक्त सर्वरस, सर्वगन्ध अजर अमर सब ओरसे पाणिपादयुक्त मैं अन्तर्यामी सनातन हूँ ॥ ४८ ॥