भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग १ ] अरण्यकाण्ड १०५


इत्युक्त्वा बाणमादाय स्थितो राम इवाचलः ॥२१॥

स तु दृष्ट्वा रमानाथं लक्ष्मणं जानकीं तदा ।
अट्टहासं ततः कृत्वा भीषणमिदमब्रवीत् ॥२२॥
कौ युवां बाणतूणीरजटावल्कलधारिणौ ।
मुनिवेषधरौ बालौ स्त्रीसहायौ सुदुर्मदौ ॥२३॥
सुन्दरौ बत मे वक्त्रप्रविष्टकवलोपमौ ।
किमर्थमागतौ घोरं वनं व्यालनिषेवितम् ॥२४॥

श्रुत्वा रक्षोवचो रामः स्मयमान उवाच तम् ।
अहं रामस्त्वयं भ्राता लक्ष्मणो मम सम्मतः ॥२५॥
एषा सीता मम प्राणवल्लभा वयमागताः ।
पितृवाक्यं पुरस्कृत्य शिक्षणार्थं भवादृशाम् ॥२६॥

श्रुत्वा तद्रामवचनमट्टहासमथाकरोत् ।
व्यादाय वक्त्रं बाहुभ्यां शूलमादाय सत्वरः ॥२७॥
मां न जानासि राम त्वं विराधं लोकविश्रुतम् ।
मद्भयान्मुनयः सर्वे त्यक्त्वा वनमितो गताः ॥२८॥
यदि जीवितुमिच्छाऽस्ति त्यक्त्वा सीतां निरायुधौ ।
पलायतं न चेच्छीघ्रं भक्षयामि युवामहम् ॥२९॥

इत्युक्त्वा राक्षसः सीतामादातुमभिदुद्रुवे ।
रामश्चिच्छेद तद्बाहू शरेण प्रहसन्निव ॥३०॥
ततः क्रोधपरीतात्मा व्यादाय विकटं मुखम् ।
राममभ्यद्रवद्रामश्चिच्छेद परिधावतः ॥३१॥
पदद्वयं विराधस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥३२॥
ततः सर्प इवास्येन ग्रसितुं राममापतत् ।
ततोऽर्धचन्द्राकारेण बाणेनास्य महच्छिरः ॥३३॥
चिच्छेद रुधिरौघेण पपात धरणीतले ।


बाण चढ़ा पर्वतके समान निश्चल होकर खड़े हो गये ॥ २१ ॥

तदनन्तर उस राक्षसने राम, लक्ष्मण और जानकीजी-को देखकर बड़ा अट्टहास किया और सबको भयभीत करते हुए इस प्रकार कहा—॥ २२ ॥ “अरे बालको ! बाण, तूणीर और जटा-वल्कल आदि मुनिवेष धारण किये तुम कौन हो ? तुम्हारे साथमें एक स्त्री है और तुम बड़े मदोन्मत्त दिखायी देते हो ॥ २३ ॥ तुम बड़े सुन्दर हो और मेरे मुखमें जानेवाले ग्रासके समान हो । हाय ! सर्पादिकोंसे पूर्ण इस घोर वनमें तुम किसलिये आये हो ?” ॥ २४ ॥

राक्षसके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने उससे मुसकाकर कहा—“मेरा नाम राम है और यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है ॥ २५ ॥ तथा यह रमणी मेरी प्राणप्रिया सीता है । हम पिताकी आज्ञासे तुम-जैसोंको शिक्षा देनेके लिये इस वनमें आये हैं” ॥ २६ ॥

रामचन्द्रजीके ये वचन सुनकर वह ठट्ठा मारकर हँसने लगा और उसने मुँह फैलाकर तुरन्त ही अपने हाथोंमें त्रिशूल उठा लिया ॥ २७ ॥ और बोला—“राम ! क्या तुम मुझे नहीं जानते ? मैं जगत्प्रसिद्ध विराध नामक राक्षस हूँ । मेरे ही भयसे समस्त मुनिजन इस वनको छोड़कर चले गये हैं ॥ २८ ॥ यदि तुम्हें जीनेकी इच्छा है तो सीताको छोड़कर बिना अस्त्र-शस्त्रोंके भाग जाओ, नहीं तो मैं अभी तुम दोनोंको खा जाऊँगा” ॥ २९ ॥

ऐसा कह वह राक्षस सीताजीको पकड़नेके लिये उनकी ओर दौड़ा । तब रामचन्द्रजीने हँसते हुए अपने बाणसे उसकी भुजाएँ काट डालीं ॥ ३० ॥ इसपर वह अत्यन्त क्रोधसे सन्तप्त हो अपना विकराल मुख फाड़कर रामचन्द्रजीकी ओर दौड़ा । तब श्रीरघुनाथजीने अपनी ओर आते हुए विराधके दोनों पैर काट डाले। यह बड़ा ही आश्चर्य-सा हो गया ॥ ३१-३२ ॥ तदनन्तर, सर्पके समान अपने मुखसे ही रामजीको निगल जानेके लिये वह उनकी ओर बढ़ा । तब भगवान् रामने एक अर्द्धचन्द्राकार बाणसे उसका महान् शिर काट डाला । तब वह रुधिरसे लथपथ होकर तत्काल पृथिवीपर गिर पड़ा । इस प्रकार


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