अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग २ ] अरण्यकाण्ड १०९
| द्रष्टुं सुमित्रासुतजानकीभ्यां<br>तदा दयाऽस्मासु दृढा भविष्यति ॥१७॥ | आश्रमोंको देखनेके लिये चलिये। ऐसा करनेसे आपको हमपर बड़ी दया आयेगी" ॥१७॥ |
| इति विज्ञापितो रामः कृताञ्जलिपुटैर्विभुः ।<br>जगाम मुनिभिः सार्धं द्रष्टुं मुनिवनानि सः ॥१८॥ | इस प्रकार हाथ जोड़कर निवेदन किये जानेपर भगवान् राम मुनियोंके साथ उनके तपोवनोंको देखने-के लिये चले ॥ १८ ॥ |
| ददर्श तत्र पतितान्यनेकानि शिरांसि सः ।<br>अस्थिभूतानि सर्वत्र रामो वचनमब्रवीत् ॥१९॥ | वहाँ उन्होंने सब ओर बहुत-सी खोपड़ियाँ पड़ी देखीं। उन्हें देखकर श्रीरामचन्द्रजीने मुनियोंसे पूछा-॥ १९ ॥ |
| अस्थीनि केषामेतानि किमर्थं पतितानि वै ।<br>तमूचुर्मुनयो राम ऋषीणां मस्तकानि हि ॥२०॥ | "ये हड्डियाँ किनकी हैं और इस तपोभूमिमें कैसे पड़ी हैं?" तब मुनीश्वरोंने कहा-"हे राम ! ये ऋषियोंके मस्तक हैं ॥ २०॥ |
| राक्षसैर्भक्षितानीश प्रमत्तानां समाधितः ।<br>अन्तरायं मुनीनां ते पश्यन्तोऽनुचरन्ति हि ॥२१॥ | हे समर्थ ! इन्हें राक्षसोंके खा लिया है, वे राक्षस समाधिसे विरत हुए मुनीश्वरोंको भक्षण करनेके लिये मौका देखते हुए जहाँ-तहाँ घूमते रहते हैं" ॥ २१ ॥ |
| श्रुत्वा वाक्यं मुनीनां स भयदैन्यसमन्वितम् ।<br>प्रतिज्ञामकरोद्रामो वधायाशेषरक्षसाम् ॥२२॥ | मुनियोंके ये भय और दीनतापूर्ण वचन सुनकर श्रीराम-चन्द्रजीने समस्त राक्षसोंका वध करनेके लिये प्रतिज्ञा की ॥ २२ ॥ |
| पूज्यमानः सदा तत्र मुनिभिर्वनवासिभिः ।<br>जानक्या सहितो रामो लक्ष्मणेन समन्वितः ॥२३॥<br>उवास कतिचित्तत्र वर्षाणि रघुनन्दनः ।<br>एवं क्रमेण संपश्यन्नृषीणामाश्रमान्विभुः ॥२४॥ | इस प्रकार क्रमशः मुनीश्वरोंके आश्रम देखते हुए श्रीरघुनाथजी वनवासी मुनियोंद्वारा नित्य पूजित हुए सीता और लक्ष्मणके साथ वहाँ कुछ वर्ष रहे ॥ २३-२४॥ |
| सुतीक्ष्णस्याश्रमं प्रागात्प्रख्यातमृषिसङ्कुलम् ।<br>सर्वर्तुगुणसम्पन्नं सर्वकालसुखावहम् ॥२५॥ | तदनन्तर वे सुविख्यात सुतीक्ष्ण मुनिके आश्रममें गये जो ऋषियोंसे घिरा हुआ समस्त ऋतुओंके गुणोंसे युक्त और सब समय सुखदायक था ॥ २५॥ |
| राममागतमाकर्ण्य सुतीक्ष्णः स्वयमागतः ।<br>अगस्त्यशिष्यो रामस्य मन्त्रोपासनतत्परः ।<br>विधिवत्पूजयामास भक्त्युत्कण्ठितलोचनः ॥२६॥ | रामका आगमन सुन राम-मन्त्रके उपासक और अगस्त्यके शिष्य सुतीक्ष्ण उन्हें लेनेके लिये स्वयं आगे आये और उनकी विधिवत् पूजा की । उस समय सुतीक्ष्णके नेत्र भक्तिवश भगव-द्दर्शनके लिये अति उतावले हो रहे थे ॥ २६ ॥ |
| सुतीक्ष्ण उवाच<br>त्वन्मन्त्रजाप्यहमनन्तगुणाममेय<br>सीतापते शिवविरिञ्चिसमाश्रिताङ्घ्रे ।<br>संसारसिन्धुतरणामलपोतपाद<br>रामाभिराम सततं तव दासदासः ॥२७॥ | **सुतीक्ष्ण बोले—**हे अनन्त-गुण अप्रमेय सीता-पते ! मैं आपका ही मन्त्र जपता हूँ । हे अभिराम राम ! आपके चरण संसार-सागरसे पार करनेके लिये सुदृढ पोत (जहाज) स्वरूप हैं; शिव और ब्रह्मा सर्वदा उनकी सेवा करते हैं। हे नाथ ! मैं सर्वदा आपके दासोंका दास हूँ ॥ २७ ॥ |
| मामद्य सर्वजगतामविगोचरस्त्वं<br>त्वन्मायया सुतकलत्रगृहान्धकूपे ।<br>मग्नं निरीक्ष्य मलपुद्गलपिण्डमोह-<br>पाशानुबद्धहृदयं स्वयमागतोऽसि ॥२८॥ | आप समस्त संसार-की इन्द्रियोंके अविषय हैं, तथापि इस मल-मूत्रके पुतले शरीरके मोह-पाशमें जिसका हृदय बँधा हुआ है ऐसे मुझ दीनको अपनी ही मायासे मोहित होकर पुत्र-कलत्र और गृह आदिके अन्धकूपमें पड़ा देखकर आप स्वयं ही मुझे अपना पुण्य-दर्शन देनेके लिये पधारे हैं ! ॥ २८ ॥ आप समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराज- |