अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| ११६ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ४ |
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चतुर्थ सर्ग
पञ्चवटीमें निवास और लक्ष्मणजीको उपदेश।
| श्रीमहादेव उवाच | |
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| मार्गे व्रजन्ददर्शाथ शैलशृङ्गमिव स्थितम् ।<br>वृद्धं जटायुषं रामः किमेतदिति विस्मितः ॥१॥ | श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! मार्गमें जाते हुए श्रीरामचन्द्रजीने पर्वत-शिखरके समान बैठे हुए वृद्ध जटायुको देखा। उसे देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ कि 'यह क्या है ?' ॥ १ ॥ तब वे लक्ष्मणजीसे बोले—"सौमित्रे ! मेरा धनुष लाओ। देखो, सामने यह राक्षस बैठा है; मैं ऋषियोंको भक्षण करनेवाले इस दुष्टको अभी मारे डालता हूँ" ॥ २ ॥ |
| धनुरानय सौमित्रे राक्षसोऽयं पुरः स्थितः ।<br>इत्याह लक्ष्मणं रामो हनिष्याम्यृषिभक्षकम् ॥२॥ | |
| तच्छ्रुत्वा रामवचनं गृध्रराड् भयपीडितः ।<br>वधार्होऽहं न ते राम पितुस्तेऽहं प्रियः सखा ॥३॥ | रामका यह वचन सुन गृध्रराजने भयसे व्यथित होकर कहा—"राम ! मैं तुम्हारेद्वारा मारे जाने योग्य नहीं हूँ । मैं तुम्हारे पिताका प्रिय सखा जटायु नामक गृध्र हूँ । तुम्हारा कल्याण हो, मैं तो तुम्हारा हितकारी हूँ ॥ ३-४ ॥ तुम्हारी ही हित-कामनासे मैं पञ्चवटीमें रहूँगा। किसी समय जब आपके साथ लक्ष्मणजी भी मृगयाके लिये वनमें चले जायँगे तो मैं जनकनन्दिनी सीताजीकी प्रयत्नपूर्वक रक्षा करूँगा।" गृध्रराजके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने स्नेहपूर्वक कहा— ॥५-६॥ "हे गृध्रराज महाराज ! ठीक है, इस पासके वनमें ही रहते हुए आप समीपवर्ती होकर अवश्य हमारा हित-साधन करें" ॥ ७ ॥ |
| जटायुर्नाम भद्रं ते गृध्रोऽहं प्रियकृत्तव ॥४॥ | |
| पञ्चवट्यामहं वत्स्ये तवैव प्रियकाम्यया ।<br>मृगयायां कदाचित्तु प्रयाते लक्ष्मणेऽपि च ॥५॥ | |
| सीता जनककन्या मे रक्षितव्या प्रयत्नतः ।<br>श्रुत्वा तद्गृध्रवचनं रामः सस्नेहमब्रवीत् ॥६॥ | |
| साधु गृध्र महाराज तथैव कुरु मे प्रियम् ।<br>अत्रैव मे समीपस्थो नातिदूरे वने वसन् ॥७॥ | |
| इत्यामन्त्रितमालिङ्ग्य ययौ पञ्चवटीं प्रभुः ।<br>लक्ष्मणेन सह भ्रात्रा सीतया रघुनन्दनः ॥८॥ | इस प्रकार अपनी सम्मति दे भगवान् राम जटायुको आलिङ्गनकर भाई लक्ष्मण और सीताके सहित पञ्चवटीको गये ॥ ८ ॥ गौतमीके तटपर पहुँचकर उन्होंने बुद्धिमान् लक्ष्मणजीसे पञ्चवटीमें एक विशाल कुटी बनवायी ॥ ९ ॥ वहाँ वे सब गङ्गाके उत्तर तटपर कदम्ब, पनस और आम्र आदि फलवाले वृक्षोंसे युक्त एक रोग-रहित जन्य-शून्य एकान्त स्थानमें बस गये। श्रीरामचन्द्रजी बुद्धिमान् लक्ष्मणके सहित जनकात्मजा सीताका मनोरंजन करते हुए उस देवलोकके समान सुरम्य स्थानमें दूसरे इन्द्रके समान सुखपूर्वक रहने लगे। राम-सेवामें जिनका चित्त लगा हुआ है वे लक्ष्मणजी नित्यप्रति उन्हें कन्द-मूल-फल लाकर देते और रात्रिके समय धनुष-बाण लेकर चारों ओर घूमकर रक्षा करते हुए जागा करते ॥१०-१३॥ वे |
| गत्वा ते गौतमीतीरं पञ्चवट्यां सुविस्तरम् ।<br>मन्दिरं कारयामास लक्ष्मणेन सुबुद्धिना ॥९॥ | |
| तत्र ते न्यवसन्सर्वे गङ्गाया उत्तरे तटे ।<br>कदम्बपनसाम्रादिफलवृक्षसमाकुले ॥१०॥ | |
| विविक्ते जनसम्बाधवर्जिते नीरुजस्थले ।<br>विनोदयन् जनकजां लक्ष्मणेन विपश्चिता ॥११॥ | |
| अध्युवास सुखं रामो देवलोक इवापरः ।<br>कन्दमूलफलादीनि लक्ष्मणेाऽनुदिनं तयोः ॥१२॥ | |
| आनीय प्रददौ रामसेवातातपरमानसः ।<br>धनुर्बाणधरो नित्यं रात्रौ जागर्ति सर्वतः ॥१३॥ |