अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ६ ] अरण्यकाण्ड १२७
| त्वं तु मायामृगो भूत्वा ह्याश्रमादपनेष्यसि ।<br>रामं च लक्ष्मणं चैव तदा सीतां हराम्यहम् ॥ १३॥<br>त्वं तु तावत्सहायं मे कृत्वा स्थास्यसि पूर्ववत् ।<br>इत्येवं भाषमाणं तं रावणं वीक्ष्य विस्मितः ॥ १४॥<br>केनेदमुपदिष्टं ते मूलघातकरं वचः ।<br>स एव शत्रुर्बध्यश्च यस्तवन्नाशं प्रतीक्षते ॥ १५॥<br>रामस्य पौरुषं स्मृत्वा चित्तमद्यापि रावण ।<br>बालोऽपि मां कौशिकस्य यज्ञसंरक्षणाय सः ॥ १६॥<br>आगतस्तिग्मपुङ्खेन पातयामास सागरे ।<br>योजनानां शतं रामस्तदादि भयविह्वलः ॥ १७॥<br>स्मृत्वा स्मृत्वा तदेवाहं रामं पश्यामि सर्वतः ॥ १८॥<br>दण्डकेऽपि पुनरप्यहं वने<br>$\hspace{1em}$पूर्ववैरमनुचिन्तयन् हृदि ।<br>तीक्ष्णशृङ्गमृगरूपमेकदा<br>$\hspace{1em}$मादृशैर्बहुभिरानृतोऽभ्ययाम् ॥ १९॥<br>राघवं जनकजासमन्वितं<br>$\hspace{1em}$लक्ष्मणेन सहितं त्वरान्वितः ।<br>आगतोऽहमथ हन्तुमुद्यतो<br>$\hspace{1em}$मां विलोक्य शरमेकमाक्षिपत् ॥ २०॥<br>तेन विद्धहृदयोऽहमुद्भ्रमन्<br>$\hspace{1em}$राक्षसेन्द्र पतितोऽस्मि सागरे ।<br>तत्प्रभृत्यहमिदं समाश्रितः<br>$\hspace{1em}$स्थानमूर्जितमिदं भयार्दितः ॥ २१॥<br>राममेव सततं विभावये<br>$\hspace{1em}$भीत भीत इव भोगराशितः ।<br>राजरत्नरमणीरथादिकं<br>$\hspace{1em}$श्रोत्रयोर्यदि गतं भयं भवेत् ॥ २२॥<br>राम आगत इहेति शङ्कया<br>$\hspace{1em}$बाह्यकार्यमपि सर्वमत्यजम् ।<br>निद्रया परिगतो यदा स्वपे<br>$\hspace{1em}$राममेव मनसाऽनुचिन्तयन् ॥ २३॥<br>स्वप्नदृष्टगतराघवं तदा<br>$\hspace{1em}$बोधितो विगतनिद्र आस्थितः । | तुम मायासे मृगरूप होकर राम और लक्ष्मणको आश्रमसे दूर ले जाना। उसी समय मैं सीताको हर लाऊँगा ॥ १३ ॥ इस प्रकार मेरी सहायता करके तुम फिर पूर्ववत् अपने आश्रममें आ रहना ।<br>$\hspace{1em}$रावणको इस प्रकार कहते देख मारीचने विस्मित होकर कहा—॥ १४ ॥ "रावण ! ये सर्वनाश करने-वाली बातें तुम्हें किसने बतायी हैं ? इस प्रकार जो कोई तुम्हारा नाश करना चाहता है, निश्चय ही वह तुम्हारा शत्रु है और वध करने योग्य है ॥ १५ ॥ हे रावण ! उनके बाल्यकालके पौरुषको याद करके, जब वे विश्वामित्रजीकी यज्ञ-रक्षाके लिये आये थे और उन्होंने एक बाणसे ही मुझे सौ योजन दूर समुद्रके तटपर फेंक दिया था, आजतक मेरा हृदय भयसे व्याकुल हो जाता है। बारम्बार उसी बातका स्मरण हो आनेसे मुझे सब ओर राम-ही-राम दिखलायी देने लगते हैं ॥ १६–१८ ॥ एक दिन अपने पूर्व-वैरका स्मरण कर मैं दण्डकारण्यमें भी अपने-जैसे बहुत-से मृगोंके साथ मिलकर एक तीखे सींगोंवाले मृगका रूप बनाकर गया था ॥ १९ ॥ जब मैं बड़ी फुर्तीसे सीता और लक्ष्मणके सहित श्रीरघुनाथजीको मारनेकी इच्छासे आगे बढ़ा तो मुझे देखकर उन्होंने केवल एक बाण छोड़ दिया ॥ २० ॥ हे राक्षसेन्द्र ! उसीसे हृदय विंध जानेके कारण मैं आकाशमें चक्कर काटता हुआ समुद्रमें आकर गिरा। तबसे मैं भयभीत होकर इस पवित्र स्थानमें आश्रम बनाकर बड़ी सावधानीसे रहता हूँ ॥ २१ ॥ राज, रत्न, रमणी और रथ आदि (भोग-सामग्रियोंके प्रथम अक्षर 'र') के कानोंमें पड़ते ही मुझे (रामकी याद आ जानेसे) भय उत्पन्न हो जाता है, इसलिये मैं भोग-समुदायसे भयभीत होकर निरन्तर 'राम' का ही ध्यान करता रहता हूँ ॥ २२ ॥ 'यहाँ राम न आ गये हों' इस आशंकासे मैंने समस्त बाह्य कार्य छोड़ दिये हैं। जिस समय मैं निद्राके वशीभूत होकर सोता हूँ उस समय मन-ही-मन रामका ही स्मरण करता रहता हूँ ॥ २३ ॥ इस प्रकार स्वप्नमें देखे हुए श्रीरघुनाथजीको जब निद्रा टूटनेपर जागता हूँ तब भी नहीं भूलता। अतः हे रावण ! तुम भी |