अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १३० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ७ |
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मायासीतां वहिः स्थाप्य स्वयमन्तर्दधेऽनले ॥४॥ | वे मायामयी सीताको बाहर कुटीमें छोड़कर स्वयं अग्निमें अन्तर्धान हो गयीं ॥ ४ ॥ मायासीता तदाऽपश्यन्मृगं मायाविनिर्मितम् ।<br>हसन्ती राममभ्येत्य प्रोवाच विनयान्विता ॥ ५ ॥ | तत्र उस मायासीतान मायामय मृगको देखकर श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर हँसते हुए बड़ी नम्रतासे कहा—॥ ५ ॥ "हे राम ! यह रत्न-विभूषित विचित्र सुवर्ण-मृग देखिये । अहो ! इसके शरीरमें कैसे अद्भुत विन्दु हैं और यह कैसी निर्भयतासे विचर रहा है ? हे प्रभो ! आप इसे बाँधकर मुझे ला दीजिये; यह सुन्दर हरिण मेरा क्रीड़ामृग होने योग्य है" ॥ ६ ॥ पश्य राम मृगं चित्रं कनकं रत्नभूषितम् ।<br>विचित्रविन्दुभिर्युक्तं चरन्तमकुतोभयम् ।<br>बद्ध्वा देहि मम क्रीडामृगो भवतु सुन्दरः ॥ ६ ॥ तथेति धनुरादाय गच्छन् लक्ष्मणमब्रवीत् ।<br>रक्ष त्वमतियत्नेन सीतां मत्प्राणवल्लभाम् ॥ ७ ॥ | तत्र रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह अपना धनुष उठा लिया और जाते समय लक्ष्मणजीसे कहा— "लक्ष्मण ! तुम प्राण-प्रिया सीताकी यत्नपूर्वक देख-भाल करना ॥ ७ ॥ आजकल वनमें बड़े मायावी भयंकर राक्षस विचर रहे हैं। अतः तुम अनिन्दिता साध्वी सीताकी बहुत सावधान रहकर रक्षा करना" ॥ ८ ॥ मायिनः सन्ति विपिने राक्षसा घोरदर्शनाः ।<br>अतोऽत्रावहितः साध्वीं रक्ष सीतामनिन्दिताम् ॥८॥ लक्ष्मणो राममाहेदं देवोयं मृगरूपधृक् ।<br>मारीचोऽत्र न सन्देह एवंभूतो मृगः कुतः ॥ ९ ॥ | तव लक्ष्मणजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— "देव ! यह मृगरूपधारी मारीच है, इसमें सन्देह नहीं, क्योंकि भला मृग ऐसा कहाँ हो सकता है ?" ॥ ९ ॥ श्रीराम उवाच | **श्रीरामचन्द्रजी बोले—**यदि यह मारीच है तो, इसमें सन्देह नहीं, मैं इसे अवश्य मार डालूँगा । और यदि मृग ही है तो सीताका मन रखनेके लिये ले आऊँगा ॥ १० ॥ मैं अभी जाकर बहुत शीघ्र ही इस मृगको बाँधकर लिये आता हूँ, तबतक तुम सीताजीकी रखवाली करते हुए बहुत सावधान रहना ॥ ११ ॥ यदि मारीच एवायं तदा हन्मि न संशयः ।<br>मृगश्चेदानयिष्यामि सीताविश्रमहेतवे ॥१०॥ गमिष्यामि मृगं बध्वा ह्यानायिष्यामि सत्वरः ।<br>त्वं प्रयत्नेन सन्तिष्ठ सीतासंरक्षणोद्यतः ॥११॥ इत्युक्त्वा प्रययौ रामो मायामृगमलुद्रुतः ।<br>माया यदाश्रया लोकमोहिनी जगदाकृतिः ॥१२॥ | यह संसाररूपिणी जगन्मोहिनी माया जिनके आश्रित है वे रामचन्द्रजी ऐसा कह उस मायामृगके पीछे दौड़ते चले गये ॥ १२ ॥ वे निर्विकार चिदात्मा और सर्व-व्यापक होकर भी उस मृगके पीछे दौड़े, इससे यह वाक्य सर्वथा सत्य ही है कि 'भगवान् हरि बड़े भक्त-वत्सल हैं' ॥ १३ ॥ भगवान् सब कुछ जानते थे, तथापि सीताजीको प्रसन्न करनेके लिये वे मृगके पीछे गये। नहीं तो पूर्णकाम आत्मज्ञ भगवान् रामको मृग अथवा स्त्रीसे क्या काम था ? वह मृग कभी तो पास ही दिखलायी देने लगता, कभी एक क्षणमें ही दूर भागकर छिप जाता ॥ १४-१५॥ और फिर बहुत दूरीपर दिखलायी देता। इस प्रकार वह रामचन्द्रजीको बहुत दूर ले गया । निर्विकारश्चिदात्मापि पूर्णोऽपि मृगमन्वगात् ।<br>भक्तानुकम्पी भगवानिति सत्यं वचो हरिः ॥१३॥ कर्तुं सीताप्रियार्थाय जानन्नपि मृगं ययौ ।<br>अन्यथा पूर्णकामस्य रामस्य विदितात्मनः ॥१४॥ मृगेण वा स्त्रिया वापि किं कार्य परमात्मनः ।<br>कदाचिद्दृश्यतेऽभ्याशे क्षणं धावति लीयते॥१५॥<br>दृश्यते च ततो दूराद्देवं राममपाहरत् ।