अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १३८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ८ |
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मूल श्लोक:
जटायुः सन्नया वाचा वक्त्राद्रक्तं समुद्वमन् ।
उवाच रावणो राम राक्षसो भीमविक्रमः ॥ ३२॥
आदाय मैथिलीं सीतां दक्षिणाभिमुखो ययौ ।
इतो वक्तुं न मे शक्तिः प्राणांस्त्यक्ष्यामि तेऽग्रतः ॥३३॥
दिष्ट्या दृष्टोऽसि राम त्वं म्रियमाणेन मेऽनघ ।
परमात्माऽसि विष्णुस्त्वं मायामानुषरूपधृक् ॥३४॥
अन्तकालेऽपि दृष्ट्वा त्वां मुक्तोऽहं रघुसत्तम ।
हस्ताभ्यां स्पृश मां राम पुनर्यास्यामि ते पदम् ॥ ३५॥
तथेति रामः पस्पर्श तदङ्गं पाणिना स्मयन् ।
ततः प्राणान्परित्यज्य जटायुः पतितो भुवि ॥३६॥
रामस्तमनुशोचित्वा बन्धुवत्साश्रुलोचनः ।
लक्ष्मणेन समानाय्य काष्ठानि प्रददाह तम् ॥३७॥
स्नात्वा दुःखेन रामोऽपि लक्ष्मणेन समन्वितः ।
हत्वा वने मृगं तत्र मांसखण्डान्समन्ततः ॥३८॥
शाद्वले प्राक्षिपद्रामः पृथक् पृथगनेकधा ।
भक्षन्तु पक्षिणः सर्वे तृप्तो भवतु पक्षिराट् ॥३९॥
इत्युक्त्वा राघवः प्राह जटायो गच्छ मत्पदम् ।
मत्सारूप्यं भजस्वाद्य सर्वलोकस्य पश्यतः ॥४०॥
ततोऽनन्तरमेवासौ दिव्यरूपधरः शुभः ।
विमानवरमारुह्य भास्वरं भानुसन्निभम् ॥४१॥
शङ्खचक्रगदापद्मकिरीटवरभूषणैः ।
द्योतयन्स्वप्रकाशेन पीताम्बरधरोऽमलः ॥४२॥
चतुर्भिः पार्षदैर्विष्णोस्तादृशैरेभिपूजितः ।
स्तूयमानो योगिगणै राममाभाष्य सत्वरः ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा तुष्टाव रघुनन्दनम् ॥४३॥
जटायुरुवाच
अगणितगुणमप्रमेयमाद्यं
सकलजगत्स्थितिसंयमादिहेतुम् ।
हिन्दी अनुवाद:
जटायुने रक्त वमन करते हुए लड़खड़ाती बोलीमें कहा—"हे राम ! महापराक्रमी राक्षसराज रावण मिथिलेशनान्दिनी सीताको दक्षिणकी ओर ले गया है। और अधिक कहनेकी मुझमें शक्ति नहीं है। मैं अभी आपके सामने ही प्राण छोड़ना चाहता हूँ ॥३२-३३॥ हे राम ! आज बड़े भाग्यसे मैंने मरते समय आपको देख पाया है। हे अनघ ! आप मायामानवरूप साक्षात् परमात्मा विष्णु ही हैं ॥ ३४ ॥ हे रघुश्रेष्ठ ! वैसे तो अन्त समय आपका दर्शन करनेसे ही मैं मुक्त हो गया, तथापि आप मुझे अपने करकमलोंसे स्पर्श कीजिये । फिर मैं आपके परमपदको जाऊँगा" ॥ ३५ ॥
तब रामचन्द्रजीने मुसकाते हुए 'बहुत अच्छा' कह उसका शरीर अपने करकमलोंसे छुआ । तदनन्तर जटायु प्राण छोड़कर पृथिवीपर गिर पड़ा ॥ ३६ ॥ रामचन्द्रजीने नेत्रोंमें जल भरकर उसके लिये अपने स्वजनके समान शोक करते हुए लक्ष्मणसे लकड़ियां मँगवा उसका दाह-कर्म किया ॥ ३७ ॥
तत्पश्चात् रामजीने लक्ष्मणके सहित दुःखितचित्तसे स्नान किया और वनमें एक मृग मारकर घासपर सब ओर अलग-अलग उसके अनेकों मांसखण्ड बिखेर दिये । 'इन्हें सब पक्षिगण खायँ और उनसे पक्षिराज जटायु तृप्त हों' ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी बोले-“जटायो ! तुम मेरे परमपदको जाओ और आज सबके देखते-देखते मेरा सारूप्य प्राप्त करो" ॥ ३८-४० ॥ तदनन्तर वह तुरन्त ही सुन्दर दिव्य रूप धारण कर एक सूर्य-सदृश प्रकाशमान विमानपर आरूढ हुआ ॥ ४१ ॥
उस समय वह सुन्दर पीताम्बर धारण किये शंख, चक्र, गदा, पद्म और किरीट आदि श्रेष्ठ आभूषणोंके सहित अपने प्रकाशसे (सम्पूर्ण दिशाओंको) प्रकाशित कर रहा था ॥ ४२ ॥ वैसे ही वेष-भूषावाले चार विष्णु-पार्षद उसकी सेवा कर रहे थे तथा योगिगण उसकी स्तुति कर रहे थे। तदनन्तर वह हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजीको सम्बोधन कर उनकी स्तुति करने लगा।४३।
जटायु बोला—"जो अगणित गुणशाली हैं, अप्रमेय हैं, जगत्के आदिकारण हैं, तथा उसकी स्थिति और लय आदिके हेतु हैं उन परम शान्त-स्वरूप परमात्मा