भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२१६अध्यात्मरामायण[सर्ग ३

नागमिष्यति चेद्रामो भक्षयिष्यति मां खलः।<br>अतः शीघ्रं कपीन्द्रेण सुग्रीवेण समन्वितः ॥४१॥<br>वानरानीकपैरः सार्धं हत्वा रावणमाहवे।<br>सपुत्रं सबलं रामो यदि मां मोचयेत्प्रभुः ॥४२॥<br>तत्तस्य सदृशं वीर्यं वीर वर्ण्यं वर्णितम्।<br>यथा मां तारयेद्रामो हत्वा शीघ्रं दशाननम् ॥४३॥<br>तथा धत्स्व हनुमन्वाचा धर्ममवाप्नुहि। | उत्पन्न हो। हे साधुश्रेष्ठ ! अब मेरे प्राण दो ही मास और रहेंगे ॥४०॥ यदि इस बीचमें रघुनाथजी न आये तो यह दुष्ट मुझे खा जायगा। अतः यदि भगवान् राम वानरराज सुग्रीवके सहित अन्य वानर-यूथपोंको लेकर तुरन्त ही रावणको पुत्र और सेनाके सहित संग्राममें मारकर मुझे छुड़ायेंगे तो ही उनका यह पुरुषार्थ ठीक होगा। और तभी तुम इस वर्णन-किये पुरुषार्थका वर्णन करना। हे हनुमन् ! तुम भी ऐसी युक्तिसे उनसे सब बातें कहना जिससे वे शीघ्र ही रावणको मारकर मेरा उद्धार करें। ऐसा करके तुम भी वाचिक पुण्य प्राप्त करो।” हनूमानपि तामाह देवि दृष्टो यथा मया ॥४४॥<br>रामः सलक्ष्मणः शीघ्रमागमिष्यति सायुधः।<br>सुग्रीवेण ससैन्येन हत्वा दशमुखं बलात् ॥४५॥<br>समानेष्यति देवि त्वामयोध्यां नात्र संशयः। | तब हनुमान्जीने उनसे कहा—“देवि ! मैंने जैसा कुछ देखा है उससे तो यही प्रतीत होता है कि लक्ष्मणके सहित श्रीरामचन्द्रजी शीघ्र ही अस्त्र-शस्त्र लेकर सेनायुक्त सुग्रीवके सहित आयेंगे और रावणको बलपूर्वक मारकर तुम्हें अयोध्या ले जायेंगे। देवि ! इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं है।” तमाह जानकी रामः कथं वारिधिमाततम् ॥४६॥<br>तीर्त्वाऽऽयास्यत्यमेयात्मा वानरानीकपैरः सह। | इसपर जानकीजी कहने लगीं, “भगवान् राम् अमेयात्मा हैं, (उनके शरीरका कोई माप नहीं है, वे सर्वव्यापक हैं) किन्तु वानर-यूथपोंके साथ वे किस प्रकार समुद्रको पार करके यहाँ आयेंगे?” हनूमानाह मे स्कन्धावारुह्य पुरुषर्षभौ ॥४७॥<br>आयास्यतः ससैन्यश्च सुग्रीवो वानरेश्वरः।<br>विहायसा क्षणेनैव तीर्त्वा वारिधिमाततम् ॥४८॥<br>निर्दहिष्यति रक्षौघांस्त्वत्कृते नात्र संशयः।<br>अनुज्ञां देहि मे देवि गच्छामि त्वरयान्वितः॥४९॥<br>द्रष्टुं रामं सह भ्रात्रा त्वरयामि तवान्तिकम्।<br>देवि किञ्चिदभिज्ञानं देहि मे येन राघवः ॥५०॥<br>विश्वसेन्मां प्रयत्नेन ततो गन्ता समुत्सुकः। | हनुमान्जी बोले—“वे दोनों नरश्रेष्ठ मेरे कन्धों-पर चढ़कर आयेंगे और वानरराज सुग्रीव सेनासहित इस विस्तीर्ण समुद्रको आकाश-मार्गसे एक क्षणमें पार-कर तुम्हें प्राप्त करनेके लिये सम्पूर्ण राक्षस-समूहको भस्म कर डालेंगे। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। हे देवि ! अब मुझे आज्ञा दो; मैं अभी-अभी अनुज-सहित भगवान् रामका दर्शन करनेके लिये जाता हूँ और उन्हें तुरन्त तुम्हारे पास लानेका प्रयत्न करता हूँ। देवि ! मुझे कोई ऐसा चिह्न दो जिससे श्रीरघुनाथजी मेरा विश्वास करें। उसे लेकर मैं बड़ी सावधानीसे उत्सुकतापूर्वक उनके पास जाऊँगा।” ततः किञ्चिद्विचार्याथ सीता कमललोचना ॥५१॥<br>विमुच्य केशपाशान्ते स्थितं चूडामणिं ददौ।<br>अनेन विश्वसेद्रामस्त्वां कपीन्द्र सलक्ष्मणः ॥५२॥<br>अभिज्ञानार्थमन्यच्च वदामि तव सुव्रत। | तब कमललोचना सीताजीने कुछ सोच-विचारकर अपने केशपाशमें स्थित चूडामणिको निकाला और उसे हनुमान्जीको देकर कहा—“हे कपिवर ! इससे भगवान् राम और लक्ष्मण तुम्हारा विश्वास करेंगे॥४१-५२॥ हे सुव्रत ! उनको विश्वास दिलानेके

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