अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| २१८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ३ |
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| हर्षेण महताऽऽविष्टा प्राह तं कपिकुञ्जरम् ॥६५॥ | आनन्द हुआ और वे उन कपिश्रेष्ठसे कहने लगीं—॥ ६५ ॥ “हे महासत्त्व ! तुम बड़े ही सामर्थ्यवान् |
| समर्थोऽसि महासत्त्व द्रक्ष्यन्ति त्वां महाबलम् । | हो; अच्छा, अब तुम शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजीके पास |
| राक्षस्यस्ते शुभः पन्था गच्छ रामान्तिकं द्रुतम् ॥६६॥ | जाओ । हे महावीर ! तुम्हें राक्षसियाँ देख लेंगी, (अतः अब तुम जाओ ) तुम्हारा मार्ग कल्याण- |
| बुभुक्षितः कपिः प्राह दर्शनात्पारणं मम । | मय हो ॥ ६६ ॥ हनुमान्जीको भूख लगी हुई थी । |
| भविष्यति फलैः सर्वैस्तव दृष्टौ स्थितैर्हि मे ॥६७॥ | वे बोले—“देवि ! आपका दर्शन कर अब मुझे आपके सामने लगे हुए फलोंसे पारण करनेकी इच्छा होती |
| तथेत्युक्तः स जानक्या भक्षयित्वा फलं कपिः । | है” ॥ ६७ ॥ तब जानकीजीके ‘बहुत अच्छा’ कहने- |
| ततः प्रस्थापितोऽगच्छज्जानकीं प्रणिपत्य सः । | पर कपिवरने वे फल खाये और उनके विदा करनेपर |
| किञ्चिद्दूरमथो गत्वा खात्मन्येवान्वचिन्तयत् ॥६८॥ | उन्हें प्रणाम करके चल दिये । फिर कुछ दूर चलनेपर उन्होंने अपने मनमें सोचा ॥ ६८ ॥ ‘जो दूत अपने |
| कार्यार्थमागतो दूतः स्वामिकार्याविरोधतः । | स्वामीके कार्यके लिये आकर उसमें किसी प्रकारका |
| अन्यत्किञ्चिदसम्पाद्य गच्छत्यधम एव सः ॥६९॥ | विघ्न न करनेवाला कोई और कार्य न करके यों ही चला जाता है वह अधम ही है ॥ ६९ ॥ अतः |
| अतोऽहं किञ्चिदन्यच्च कृत्वा दृष्ट्वाऽथ रावणम् । | मैं कुछ और भी करूँगा और रावणसे मिलकर |
| सम्भाष्य च ततो रामदर्शनार्थं व्रजाम्यहम् ॥७०॥ | तथा बातचीत कर फिर श्रीरघुनाथजीके दर्शनार्थ जाऊँगा” ॥ ७० ॥ |
| इति निश्चित्य मनसा वृक्षखण्डान्महाबलः । | मनमें ऐसा निश्चय कर महाबली हनुमान्जीने वृक्षों- |
| उत्पाट्याशोकवनिकां निर्वृक्षामकरोत्क्षणात् ॥७१॥ | को उखाड़कर अशोकवाटिकाको एक क्षणमें ही वृक्षहीन कर दिया ॥ ७१ ॥ जिसके नीचे श्रीसीताजी |
| सीताऽऽश्रयनगं त्यक्त्वा वनं शून्यं चकार सः । | बैठी थीं उस वृक्षको छोड़कर शेष समस्त वाटिकाको |
| उत्पाटयन्तं विपिनं दृष्ट्वा राक्षस्योषितः ॥७२॥ | उन्होंने उजाड़ डाला । उन्हें वन उजाड़ते देख |
| अपृच्छन् जानकीं कोऽसौ वानराकृतिरुद्भटः ॥७३॥ | राक्षसियोंने जानकीजीसे पूछा, “यह वानराकार विकट वीर कौन है ?” ॥ ७२-७३ ॥ |
| जानक्युवाच | जानकीजी बोलीं— इस राक्षसी मायाको आप ही |
| भवत्य एव जानन्ति मायां राक्षवनिर्मिताम् । | लोग जानें। दुःख और शोकसे आतुर मैं यह क्या जानूँ ? |
| नाहमेनं विजानामि दुःखशोकसमाकुला ॥७४॥ | ॥ ७४ ॥ जानकीजीके इस प्रकार कहनेपर भयपीडिता |
| इत्युक्तास्त्वरितं गत्वा राक्षस्यो भयपीडिताः । | राक्षसियोंने रावणके पास जा उसे हनुमान्जीकी सारी |
| हनूमता कृतं सर्वं रावणाय न्यवेदयन् ॥७५॥ | करतूत कह सुनायी ॥७५॥ वे कहने लगीं— “देव ! एक |
| देव कश्चिन्महासत्त्वो वानराकृतिदेहभृत् । | बड़े पराक्रमी वानराकार प्राणीने सीताजीसे सम्भाषण |
| सीतया सह सम्भाष्य ह्यशोकवनिकां क्षणात् । | कर एक क्षणमें ही सारी अशोकवाटिका उजाड़ दी |
| उत्पाट्य चैत्यप्रासादं बभञ्जामितविक्रमः ॥७६॥ | है। उस महापराक्रमीने मन्दिरके प्रासादको भी तोड़ डाला और उसके सब रक्षकोंको मारकर इस समय |
| प्रासादरक्षिणः सर्वान्हत्वा तत्रैव तस्थिवान् । | भी वह वहीं बैठा हुआ है ।” वनविध्वंसका यह महान् |
| तच्छ्रुत्वा तूर्णमुत्थाय वनभङ्गं महाऽप्रियम् ॥७७॥ | अप्रिय समाचार सुनकर राक्षसराज रावण तुरन्त उठा |