अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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२२६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५
पञ्चम सर्ग
हनुमान्जीका सीताजीसे विदा होना और श्रीरामचन्द्रजीको उनका सन्देश सुनाना।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! तदनन्तर श्रीहनुमान्जीने सीताजीके पास जाकर उन्हें प्रणाम करके कहा—"देवि ! आप मुझे आज्ञा दीजिये; अब मैं श्रीरघुनाथजीके पास जाता हूँ; वे शीघ्र ही भाई लक्ष्मणसहित आपसे मिलनेके लिये यहाँ आयेंगे।" ऐसा कह पवननन्दन हनुमान्जीने जानकीजीकी तीन परिक्रमाएँ कर उन्हें प्रणाम किया और जानेके लिये कुछ दूर चलकर बोले—"देवि ! मैं जाता हूँ, आपका शुभ हो, आप शीघ्र ही सुग्रीव और करोड़ों अन्य वानरोंके सहित भगवान् राम और लक्ष्मणको देखेंगी।" तब दुःखसे दुर्बल हुई जानकीने हनुमान्जीसे कहा—"तुम्हें देखकर मैं अपना दुःख भूल गयी थी। अब तुम जा रहे हो; अब, श्रीरामचन्द्रजीका समाचार सुने बिना मैं कैसे रहूँगी"? ॥ १-५ ॥ |
|---|---|
| ततः सीतां नमस्कृत्य हनुमानब्रवीद्वचः।<br>आज्ञापयतु मां देवि भवती रामसन्निधिम् ॥ १ ॥<br>गच्छामि रामस्त्वां द्रष्टुमागमिष्यति सानुजः।<br>इत्युक्त्वा त्रिःपरिक्रम्य जानकीं मारुतात्मजः॥२॥<br>प्रणम्य प्रस्थितो गन्तुमिदं वचनमब्रवीत् ।<br>देवि गच्छामि भद्रं ते तूर्णं द्रक्ष्यसि राघवम् ॥ ३ ॥<br>लक्ष्मणं च ससुग्रीवं वानरायुतकोटिभिः ।<br>ततः प्राह हनूमन्तं जानकी दुःखकर्शिता ॥ ४ ॥<br>त्वां दृष्ट्वा विस्मृतं दुःखमिदानीं त्वं गमिष्यसि ।<br>इतः परं कथं वर्ते रामवार्ताश्रुतिं विना ॥ ५ ॥ |
मारुतिरुवाच
| यद्येवं देवि मे स्कन्धमारोह क्षणमात्रतः ।<br>रामेण योजयिष्यामि मन्यसे यदि जानकि ॥ ६ ॥ | **हनुमान्जी बोले—**हे देवि ! यदि ऐसी बात है और आप स्वीकार करें तो हे जनकनन्दिनी ! आप मेरे कन्धेपर चढ़ लीजिये, मैं एक क्षणमें ही श्रीरामचन्द्रजीसे आपको मिला दूँगा ॥ ६ ॥ |
सीतोवाच
| रामः सागरमाशोष्य बद्ध्वा वा शरपञ्जरैः ।<br>आगत्य वानरैः सार्धं हत्वा रावणमाहवे ॥ ७ ॥<br>मां नयेद्यदि रामस्य कीर्तिर्भवति शाश्वती ।<br>अतो गच्छ कथं चापि प्राणान्सन्धारयाम्यहम् ॥८॥ | **सीताजीने कहा—**यदि श्रीरामचन्द्रजी समुद्रको सुखाकर या उसे बाणोंसे बाँधकर यहाँ वानरोंके साथ आयें और रावणको युद्धमें मारकर मुझे ले जायँ तो इससे उन्हें अमर कीर्ति प्राप्त होगी। इसलिये तुम जाओ, मैं जैसे-तैसे प्राण धारण करूँगी ॥ ७-८ ॥ |
| इति प्रस्थापितो वीरः सीतया प्रणिपत्य ताम् ।<br>जगाम पर्वतस्याग्रे गन्तुं पारं महोदधेः ॥ ९ ॥<br>तत्र गत्वा महासत्त्वः पादाभ्यां पीडयन् गिरिम् ।<br>जगाम वायुवेगेन पर्वतश्च महीतलम् ॥१०॥<br>गतो महीसमानत्वं त्रिंशद्योजनमुच्छ्रितः।<br>मारुतिर्गगनान्तस्थो महाशब्दं चकार सः ॥११॥<br>तं श्रुत्वा वानराः सर्वे ज्ञात्वा मारुतिमागतम् ।<br>हर्षेण महताऽऽविष्टाः शब्दं चक्रुर्महास्वनम् ॥१२॥ | सीताजीसे इस प्रकार विदा हो वीरवर हनुमान् उन्हें प्रणाम कर महासागरके पार जानेके लिये पर्वत-शिखरपर चढ़ गये ॥ ९ ॥ वहाँ पहुँचकर महावीर हनुमान्जी पर्वतको अपने पैरोंसे दबाकर वायुवेगसे चले और (उनके दबानेसे) वह तीस योजन ऊँचा पर्वत पृथिवीमें घुसकर समतल हो गया। हनुमान्जीने आकाशमें जाते समय बड़ा घोर शब्द किया ॥ १०-११ ॥ उसे सुनकर सब वानरगण, यह जानकर कि हनुमान्जी लौट रहे हैं, बड़े आनन्दमें भरकर घोर शब्द करने लगे ॥ १२ ॥ (वे आपसमें कहने लगे—) |