अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२८ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५
दृष्ट्वाऽऽगतो न सन्देहः सीतां पवननन्दनः ॥२६॥ नो चेन्मधुवनं द्रष्टुं समर्थः को भवेन्मम । तत्रापि वायुपुत्रेण कृतं कार्यं न संशयः ॥२७॥
श्रुत्वा सुग्रीववचनं हृष्टो रामस्तमब्रवीत् । किमुच्यते त्वया राजन्यचः सीताकथान्वितम् ॥२८॥
सुग्रीवस्त्वब्रवीद्वाक्यं देव दृष्टाऽवनीसुता । हनूमत्प्रमुखाः सर्वे प्रविष्टा मधुकाननम् ॥२९॥
भक्षयन्ति स्म सकलं ताडयन्ति स्म रक्षिणः । अकृत्वा देवकार्यं ते द्रष्टुं मधुवनं मम ॥३०॥
न समर्थास्ततो देवी दृष्टा सीतेति निश्चितम् । रक्षिणो वो भयं माऽस्तु गत्वा ब्रूत ममाज्ञया ॥३१॥
वानरानङ्गदप्रमुखानिनयध्वं ममान्तिकम् । श्रुत्वा सुग्रीववचनं गत्वा ते वायुवेगतः ॥३२॥
हनुमत्प्रमुखानुचुर्गच्छतेश्वरशासनात् । द्रष्टुमिच्छति सुग्रीवः सरामो लक्ष्मणान्वितः ॥३३॥
युष्मानतीव हृष्टास्ते त्वरयन्ति महाबलाः । तथेत्यम्बरमासाद्य ययुस्ते वानरोत्तमाः ॥३४॥
हनूमन्तं पुरस्कृत्य युवराजं तथाऽङ्गदम् । रामसुग्रीवयोग्रे निपेतुर्भुवि सत्वरम् ॥३५॥
हनूमान् राघवं प्राह दृष्टा सीता निरामया । साष्टाङ्गं प्रणिपत्याग्रे रामं पश्चाद्धरीश्वरम् ॥३६॥
कुशलं प्राह राजेन्द्र जानकी त्वां शुचान्विता । अशोकवनिकामध्ये शिंशपामूलमाश्रिता ॥३७॥
राक्षसीभिः परिवृता निराहारा कृशा प्रभो । हा राम राम रामेति शोचन्ती मलिनाम्बरा ॥३८॥
एकवेणी मया दृष्टा शनैराश्वासिता शुभा ।
हैं; नहीं तो, मेरे मधुवनकी ओर देखनेकी भला किसे सामर्थ्य थी ? और उनमें भी निस्सन्देह यह कार्य किया हनुमान्जीने ही है"॥ २६-२७ ॥
सुग्रीवके वचन सुनकर भगवान् रामने प्रसन्न हो उनसे पूछा—"राजन् ! यह सीता-सम्बन्धी तुम क्या बात कह रहे हो ?" ॥ २८ ॥ सुग्रीवने कहा—"भगवन् ! मालूम होता है भूमिसुता जानकीजीका पता लग गया है, क्योंकि हनुमान् आदि समस्त वानरगण मधुवनमें घुसकर उसके फल खा रहे हैं और उसके रक्षकोंको मारते हैं। बिना आपका कार्य किये तो वे मेरे मधुवनकी ओर देख भी नहीं सकते थे। अतः यह निश्चय होता है कि वे देवी जानकीजीसे मिल आये हैं। रक्षको ! तुम डरो मत, उन्हें जाकर मेरी आज्ञा सुनाओ और उन अंगदादि वानरोंको मेरे पास ले आओ।" सुग्रीवकी आज्ञा सुनकर वे वायुवेग से चले और हनुमान् आदिसे कहा—"महाराजकी आज्ञा है, आपलोग तुरन्त वहाँ जाइये क्योंकि राम और लक्ष्मणके सहित महाराज सुग्रीव आपलोगोंसे मिलना चाहते हैं। हे महावीरगण ! आपलोगोंसे प्रसन्न होकर वे आपको बहुत शीघ्र बुला रहे हैं।" तब वे वानरश्रेष्ठ 'बहुत अच्छा' कह आकाशमें चढ़कर चलने लगे। वे सब वानरगण हनुमान् और युवराज अंगदको आगे कर चले और तुरन्त ही राम और सुग्रीवके सामने पृथिवीपर उतर आये ॥ २९–३५ ॥
हनुमान्जीने पहले श्रीरघुनाथजीको और फिर वानरराज सुग्रीवको साष्टाङ्ग प्रणाम कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"मैं सीताजीको सकुशल देख आया हूँ ॥ ३६ ॥ हे राजेन्द्र ! शोकमग्ना जानकीजीने आपको अपना कुशल-समाचार सुनानेके लिये कहा है। वे अशोक-वाटिकाके बीचमें शिंशपा वृक्षके तले बैठी हैं, और हे प्रभो ! सदा राक्षसियोंसे घिरी रहती हैं, अन्न-जल छोड़ देनेके कारण वे अत्यन्त दुर्बल हो गयी हैं, और निरन्तर 'हा राम ! हा राम !' कहकर शोक करती रहती हैं, उनके वस्त्र मलिन हो गये हैं तथा बालोंकी मिलकर एक वेणी हो गयी है—ऐसी अवस्था-