भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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२३०अध्यात्मरामायण[ सर्ग ५

दत्त्वा काकेन यद्वृत्तं चित्रकूटगिरौ पुरा ॥५३॥ तदप्याहाश्रुपूर्णाक्षी कुशलं ब्रूहि राघवम् । लक्ष्मणं ब्रूहि मे किञ्चिद्दुरुक्तं भाषितं पुरा ॥५४॥ तत्क्षमस्वाज्ञभावेन भाषितं कुलनन्दन । तारयेन्मां यथा रामस्तथा कुरु कृपान्वितः ॥५५॥

इत्युक्त्वा रुदती सीता दुःखेन महताऽऽवृता । मयाऽप्याश्वासिता राम वदता सर्वमेव ते ॥५६॥ ततः प्रस्थापितो राम त्वत्समीपमिहागतः । तदागमनवेलायामशोकवनिकां प्रियाम् ॥५७॥ उत्पाट्य राक्षसांस्तत्र बहून्हत्वा क्षणादहम् । रावणस्य सुतं हत्वा रावणेनाभिभाष्य च ॥५८॥ लङ्कामशेषतो दग्ध्वा पुनरप्यगमं क्षणात् ।

श्रुत्वा हनूमतो वाक्यं रामोऽत्यन्तप्रहृष्टधीः ॥५९॥ हनूमंस्ते कृतं कार्यं देवैरपि सुदुष्करम् । उपकारं न पश्यामि तव प्रत्युपकारिणः ॥६०॥ इदानीं ते प्रयच्छामि सर्वस्वं मम मारुते । इत्यालिङ्ग्य समाकृष्य गाढं वानरपुङ्गवम् ॥६१॥ सार्द्रनेत्रो रघुश्रेष्ठः परां प्रीतिमवाप सः । हनूमन्तमुवाचेदं राघवो भक्तवत्सलः ॥६२॥ परिरम्भो हि मे लोके दुर्लभः परमात्मनः । अतस्त्वं मम भक्तोऽसि प्रियोऽसि हरिपुङ्गव ॥६३॥

यत्पादपङ्कजयुगलं तुलसीदलाद्यैः संपूज्य विष्णुपदवीमतुलां प्रयान्ति । तेनैव किं पुनरसौ परिरब्धमूर्तिं रामेण वायुतनयः कृतपुण्यपुञ्जः ॥६४॥

चित्रकूट पर्वतपर काकके साथ जो कुछ हुआ था वह सब भी सुनाया तथा नेत्रोंमें जल भरकर कहा—"रघुनाथजीसे मेरी कुशल कहना और लक्ष्मणजीसे कहना कि हे कुलन्दन ! मैंने पहले तुमसे जो कुछ कठोर वचन कहे थे उन अज्ञानवश कहे हुए वाक्योंके लिये मुझे क्षमा करें। इसके सिवा जिस प्रकार रघुनाथजी कृपा करके मेरा उद्धार करें वही चेष्टा करना" ॥५३–५५॥

"ऐसा कहकर सीताजी महान् दुःखमें भरकर रोने लगीं; मैंने भी उन्हें आपका सब वृत्तान्त सुनाकर ढाँढस बँधाया और फिर उनसे विदा होकर आपके पास चला आया। आती-बार मैंने रावणकी प्रिय अशोक वाटिका उजाड़ दी और एक क्षणमें ही बहुतसे राक्षस मार डाले। रावणके पुत्रको भी मारा और रावणसे वार्तालाप कर लंकाको सब ओरसे जलाकर फिर क्षणभरमें ही यहाँ चला आया।"

हनुमान्जीके ये वचन सुन श्रीरामचन्द्रजी अति प्रसन्न होकर कहने लगे–॥५६-५९॥ "हनुमन् ! तुमने जो कार्य किया है वह देवताओंसे भी होना कठिन है, मैं इसके बदलेमें तुम्हारा क्या उपकार करूँ—सो नहीं जानता ॥६०॥ लो, मैं अभी तुम्हें अपना सर्वस्व सौंपता हूँ।" ऐसा कह उन्होंने वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीको खींचकर गाढ़ आलिङ्गन किया ॥ ६१ ॥ उनके नेत्रोंमें जल भर आया और हृदयमें परम प्रेम उमड़ने लगा। तब भक्तवत्सल रघुनाथजीने हनुमान्जीसे कहा–॥ ६२ ॥ "संसारमें मुझ परमात्माका आलिङ्गन मिलना अत्यन्त दुर्लभ है, हे वानरश्रेष्ठ ! (तुम्हें यह सौभाग्य प्राप्त हुआ है) अतः तुम मेरे परम भक्त और प्रिय हो" ॥ ६३ ॥

हे पार्वति ! जिनके चरणारविन्दयुगलका तुलसीदल आदिसे पूजन कर भक्तजन अतुलनीय विष्णुपद प्राप्त करते हैं उन्हीं रामने जिनके शरीरका आलिङ्गन किया उन पवित्र कर्म करनेवाले पवनपुत्रके विषयमें क्या कहा जाय ? ॥ ६४ ॥


इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे सुन्दरकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

समाप्तमिदं सुन्दरकाण्डम्