अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग १
एवं ते वानरश्रेष्ठा गच्छन्त्यतुलविक्रमाः ॥३६॥ हरिभ्यामुह्यमानौ तौ शुशुभाते रघूत्तमौ । नक्षत्रैः सेवितौ यद्वच्चन्द्रसूर्याविवाम्बरे ॥३७॥ आवृत्य पृथिवीं कृत्स्नां जगाम महती चमूः । प्रस्फोटयन्तः पुच्छाग्राल्लुङ्हन्तश्च पादपान् ॥३८॥ शैला नारोहयन्तश्च जग्मुर्मारुतवेगतः । असङ्ख्याताश्च सर्वत्र वानराः परिपूरिताः ॥३९॥ हृष्टास्ते जग्मुरत्यर्थं रामेण परिपालिताः । गता चमूर्दिंवारान्नं कचिन्नासज्जत क्षणम् ॥४०॥ काननानि विचित्राणि पश्यन्मलयसह्ययोः । ते सह्यं समतिक्रम्य मलयं च तथा गिरीन् ॥४१॥ आययुश्चानुपूर्व्येण समुद्रं भीमनिःस्वनम् । अवतीय हनूमन्तं रामः सुग्रीवसंयुतः ॥४२॥ सलिलाभ्याशमासाद्य रामो वचनमब्रवीत् । आगताः स्म वयं सर्वे समुद्रं मकरालयम् ॥४३॥ इतो गन्तुमशक्यं नो निरुपायेन वानराः । अत्र सेनानिवेशोऽस्तु मन्त्रयामोऽस्य तारणे ॥४४॥
श्रुत्वा रामस्य वचनं सुग्रीवः सागरान्तिके । सेनां निवेशयत्क्षिप्रं रक्षितां कपिकुञ्जरैः ॥४५॥ ते पश्यन्तो विषेदुस्तं सागरं भीमदर्शनम् । महोन्नततरङ्गाढ्यं भीमनक्रमयङ्करम् ॥४६॥ अगाधं गगनाकारं सागरं वीक्ष्य दुःखिताः । तरिष्यामः कथं घोरं सागरं वरुणालयम् ॥४७॥ हन्तव्योऽस्माभिरद्यैव रावणो राक्षसाधमः । इति चिन्ताकुलाः सर्वे रामपार्श्वे व्यवस्थिताः ॥४८॥ रामः सीतामनुस्मृत्य दुःखेन महताऽऽवृतः । विलप्य जानकीं सीतां बहुधा कार्यमानुषः ॥४९॥
सामने 'हम आज ही रावणको मार डालेंगे' ऐसा कहते हुए जा रहे थे ॥ ३६ ॥ हनुमान् और अंगदके कन्धोंपर जाते हुए वे दोनों रघुश्रेष्ठ ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो आकाश-मण्डलमें नक्षत्रोंसे सुसेवित सूर्य और चन्द्रमा हों ॥ ३७ ॥ वह महान् सेना सम्पूर्ण पृथिवी-को घेरकर चल रही थी। वानरगण अपनी पूँछ फटकारते और पेड़ोंको उखाड़ते हुए पर्वतोंपर उछलते-कूदते वायुवेगसे जा रहे थे। उस समय सब ओर असंख्य वानर भरे हुए दीख पड़ते थे ॥ ३८-३९ ॥ भगवान् रामसे सुरक्षित होकर वे प्रसन्नतापूर्वक बड़ी तेजीसे जा रहे थे। वह वानर-सेना रात-दिन चलनी थी, कहीं एक क्षणको भी न रुकती थी ॥ ४० ॥ अन्तमें वे सबलोग मलयाचल और सह्याद्रिके विचित्र वनोंको देखते हुए उन दोनों पर्वतोंको पार कर क्रमशः भयङ्कर गर्जना करनेवाले समुद्रके तटपर पहुँच गये । तब श्रीरामचन्द्रजी हनुमान्जीके कन्धेसे उतरकर सुग्रीवके साथ जलके निकट आये और बोले—"हे वानरगण ! हमलोग मकरादिसे पूर्ण समुद्रके तटपर तो आ गये, किन्तु अब आगे बिना कोई विशेष उपाय किये हम नहीं जा सकते । अतः अब यहीं सेनाकी छावनी डाली जाय । हमलोग समुद्र पार करनेके विषयमें परस्पर परामर्श करेंगे" ॥ ४१–४४ ॥
रामके वचन सुनकर सुग्रीवने तुरन्त ही समुद्रके निकट सेनाका पड़ाव डाला । और बहुत-से प्रधान-प्रधान वानर-वीर उसकी रक्षा करने लगे ॥ ४५ ॥ वे लोग उत्ताल तरङ्गोंसे पूर्ण तथा दारुण नाके आदिके कारण भयङ्कर समुद्रको देखकर मन-ही-मन विषाद करने लगे ॥ ४६ ॥ उस आकाशके समान अगाध समुद्रको देखकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ और वे सोचने लगे कि 'हम इस घोर वरुणालयको कैसे पार करेंगे ॥४७॥ राक्षसाधम रावणको तो हमें आज ही मारना है (पर मारें कैसे ?)' इस प्रकार सब लोग अति चिन्ताग्रस्त हो श्रीरघुनाथजीके पास बैठ गये ॥ ४८ ॥
इधर श्रीरामचन्द्रजी भी सीताकी यादकर महान् दुःखमें डूब गये । वे यद्यपि एक अद्वितीय चिन्मात्र