अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २४० | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग २ |
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कालेन नोदितो दैत्यो विभीषणमथाब्रवीत् ।<br>मद्दत्तभोगैः पुष्टाङ्गो मत्समीपे वसन्नपि ॥२८॥<br>प्रतीपमाचरत्येष ममैव हितकारिणः ।<br>मित्रभावेन शत्रुर्मे जातो नास्त्यत्र संशयः ॥२९॥<br>अनार्येण कृतघ्नेन सङ्गतिर्मे न युज्यते ।<br>विनाशमभिकाङ्क्षन्ति ज्ञातीनां ज्ञातयः सदा॥३०॥<br>योऽन्यस्त्वेवंविधं ब्रूयाद्वाक्यमेकं निशाचरः ।<br>हन्मि तस्मिन् क्षणे एव धिक् त्वां रक्षःकुलाधमम्॥३१<br>रावणेनैवमुक्तः सन्परुषं स विभीषणः ।<br>उत्पपात सभामध्याद्गदापाणिर्महाबलः ॥३२॥<br>चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं गगनस्थोऽब्रवीद्वचः ।<br>क्रोधेन महताऽऽविष्टो रावणं दशकन्धरम् ।<br>मा विनाशमुपैहि त्वं प्रियवादिनमेव माम् ॥३३॥<br>धिक्करोषि तथापि त्वं ज्येष्ठो भ्राता पितुः समः ।<br>कालो राघवरूपेण जातो दशरथालये ॥३४॥<br>काली सीताऽभिधानेन जाता जनकनन्दिनी ।<br>तावुभावागतावत्र भूमेर्भारापनुत्तये ॥३५॥<br>तेनैव प्रेरितस्त्वं तु न शृणोषि हितं मम ।<br>श्रीरामः प्रकृतेः साक्षात्परस्तात्सर्वदा स्थितः॥३६॥<br>बहिरन्तश्च भूतानां समः सर्वत्र संस्थितः ।<br>नामरूपादिभेदेन तत्तन्मय इवामलः ॥३७॥<br>यथा नानाप्रकारेपु वृक्षेष्वेको महानलः ।<br>तत्तदाकृतिभेदेन भिद्यतेऽज्ञानचक्षुषाम् ॥३८॥<br>पञ्चकोशादिभेदेन तत्तन्मय इवावभौ ।<br>नीलपीतादियोगेन निर्मलः स्फटिको यथा ॥३९॥<br>स एव नित्यमुक्तोऽपि स्वमायागुणबिम्बितः ।<br>कालः प्रधानं पुरुषोऽव्यक्तं चेति चतुर्विधः ॥४०॥ | वह दुष्ट दैत्य कालकी प्रेरणासे विभीषणसे इस प्रकार कहने लगा—“देखो, यह मेरे ही दिये हुए भोगोंसे पुष्ट होकर और मेरे ही पास रहकर भी मुझ अपने हितकर्ताके ही विरुद्ध चलता है; निःसन्देह यह मित्ररूपसे मेरा शत्रु ही प्रकट हुआ है॥ २८-२९ ॥ इस अनार्य और कृतघ्नका मेरे साथ रहना ठीक नहीं है। प्रायः यह देखनेमें आता है कि जातिवाले अपने ही जाति-भाइयोंके नाशकी सदा इच्छा किया करते हैं॥ ३० ॥ यदि कोई और राक्षस ऐसा एक भी वाक्य कहता तो मैं उसे उसी क्षण मार डालता ! अरे नीच ! तू राक्षसकुलमें अत्यन्त अधम है, तुझे धिक्कार है" ॥ ३१ ॥<br><br>रावणके इस प्रकार कटुवचन कहनेपर महाबली विभीषण हाथमें गदा लेकर सभासे उड़े ॥ ३२ ॥ और अपने चार मन्त्रियोंके साथ आकाशमें स्थित होकर अत्यन्त क्रोधमें भरकर दशशीश रावणसे कहा—॥ ३३ ॥ “मैं तुम्हारे हितकी बात कहनेवाला हूँ; फिर भी तुम मुझे धिक्कारते हो ! तथापि मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा नाश न हो, क्योंकि तुम मेरे बड़े भाई हो; अतः पिताके समान हो। तुम्हारा काल रघुनाथजीके रूपसे महाराज दशरथके घरमें प्रकट हो गया है ॥३४॥ और महाशक्ति काली 'सीता' नामसे जनकजीकी पुत्री हुई है। ये दोनों पृथिवीका भार उतारनेके लिये ही यहाँ आये हैं ॥ ३५ ॥ उन्हींकी प्रेरणासे तुम मेरा हितकर वचन नहीं सुनते। भगवान् राम सर्वदा साक्षात् प्रकृतिसे परे हैं ॥ ३६ ॥ वे प्राणियोंके बाहर-भीतर सर्वत्र समान भावसे स्थित हैं और नित्य निर्मल होते हुए भी नाम-रूप आदि भेदसे विभिन्न-से भासते हैं ॥३७॥ जिस प्रकार अज्ञानी पुरुषोंकी दृष्टिमें एक ही महाग्नि नाना प्रकारके वृक्षोंमें उनके आकार-भेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है, अथवा जैसे शुद्ध स्फटिक मणि नील-पीतादि रङ्गोंकी सन्निधिमात्रसे ही नील-पीत आदि वर्णोंवाली प्रतीत होती है, वैसे ही पञ्चकोश आदिके भेदसे आत्मा तद्रूप-सा भासता है ॥ ३८-३९ ॥ वे (श्रीभगवान् ही) नित्यमुक्त होकर भी अपनी मायाके गुणोंमें प्रतिबिम्बित होकर काल, प्रधान, पुरुष और अव्यक्त इन चार प्रकारके नामोंसे कहे जाते हैं॥ ४० ॥ वे