भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ३ ]
युद्धकाण्डम्
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त्रैलोक्यगुरवेऽनादिगृहस्थाय नमोनमः ॥१९॥के गुरु और अनादिकालीन गृहस्थ* हैं उन महात्मा रामको बारम्बार नमस्कार है ॥ १९ ॥ हे राम ! आप
त्वमादिर्जगतां राम त्वमेव स्थितिकारणम् ।संसारकी उत्पत्ति और स्थितिके कारण हैं तथा अन्तमें-
त्वमन्ते निधनस्थानं स्वेच्छाचारस्त्वमेव हि ॥२०॥आप ही उसके लयस्थान हैं; आप अपनी इच्छानुसार विहार करनेवाले हैं ॥ २० ॥ हे राघव ! चराचर भूतों-
चराचराणां भूतानां बहिरन्तश्च राघव ।के भीतर और बाहर व्याप्य-व्यापक-रूपसे आप विश्वरूप
व्याप्यव्यापकरूपेण भवान् भाति जगन्मयः ॥२१॥ही भास रहे हैं ॥ २१ ॥ आपकी मायाने जिनका
त्वन्मायया हृतज्ञाना नष्टात्मानो विचेतसः।सदसद्विवेक हर लिया है वे नष्ट-बुद्धि मूढ़ पुरुष अपने पाप-पुण्यके वशीभूत होकर संसारमें बारम्बार आते-
गतागतं प्रपद्यन्ते पापपुण्यवशात्सदा ॥२२॥जाते रहते हैं ॥ २२ ॥ जबतक मनुष्य एकाग्र
तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा ।चित्तसे आपके ज्ञानस्वरूपको नहीं जानता तभीतक
यावन्न ज्ञायते ज्ञानं चेतसाऽनन्यगामिना ॥२३॥सीपीमें चाँदीके समान यह संसार सत्य प्रतीत होता है ॥ २३ ॥ हे विभो ! आपको न जाननेसे ही लोग पुत्र, स्त्री
त्वदज्ञानात्सदा युक्ताः पुत्रदारगृहादिषु ।और गृह आदिमें आसक्त होकर अन्तमें दुःख देनेवाले
रमन्ते विषयान्सर्वानन्ते दुःखप्रदान्विभो ॥२४॥विषयोंमें सुख मानते हैं ॥ २४ ॥ हे पुरुषोत्तम ! आप ही इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण और वायु हैं तथा आप
त्वमिन्द्रोऽग्निर्यमो रक्षो वरुणश्च तथानिलः ।ही कुबेर और रुद्र हैं ॥ २५ ॥ हे प्रभो ! आप अणु-से-
कुबेरश्च तथा रुद्रस्त्वमेव पुरुषोत्तम ॥२५॥अणु और महान्-से-महान् हैं तथा आप ही समस्त लोकोंके पिता, माता और धाता (धारण-पोषण करनेवाले) हैं
त्वमणोरप्यणीयांश्च स्थूलात् स्थूलतरः प्रभो ।॥ २६ ॥ आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वत्र परिपूर्ण
त्वं पिता सर्वलोकानां माता धाता त्वमेव हि ॥२६॥अच्युत और अविनाशी हैं । आप हाथ-पाँवसे रहित तथा नेत्र और कर्णहीन हैं ॥ २७ ॥ तथापि हे
आदिमध्यान्तरहितः परिपूर्णोऽच्युतोऽव्ययः ।खरान्तक ! आप सब कुछ देखनेवाले, सब कुछ सुनने-
त्वं पाणिपादरहितश्चक्षुःश्रोत्रविवर्जितः ॥२७॥वाले, सब कुछ ग्रहण करनेवाले और बड़े वेगवान् हैं । हे प्रभो ! आप अन्नमय आदि पाँचों कोशोंसे रहित तथा
श्रोता द्रष्टा ग्रहीता च जवनस्त्वं खरान्तक ।निर्गुण और निराश्रय हैं ॥ २८ ॥ आप निर्विकल्प,
कोशेभ्यो व्यतिरिक्तस्त्वं निर्गुणो निरूपाश्रयः ॥२८॥निर्विकार और निराकार हैं, आपका कोई प्रेरक नहीं
निर्विकल्पो निर्विकारो निराकारो निरीश्वरः ।है, आप (उत्पत्ति, वृद्धि, परिणाम, क्षय, जीर्णता और नाश—इन) छः भाव-विकारोंसे रहित हैं तथा
षड्भावरहितोऽनादिः पुरुषः प्रकृतेः परः ॥२९॥प्रकृतिसे अतीत अनादि पुरुष हैं ॥ २९ ॥ मायाके
मायया गृह्यमाणस्त्वं मनुष्य इव भाव्यसे ।कारण ही आप साधारण मनुष्यके समान प्रतीत होते हैं; वैष्णवजन आपको निर्गुण और अजन्मा जानकर मोक्ष
ज्ञात्वा त्वां निर्गुणमजं वैष्णवा मोक्षगामिनः ॥३०॥प्राप्त करते हैं ॥ ३० ॥ हे राघव ! हे प्रभो ! मैं आप-
अहं त्वत्पादसद्भक्तिनिःश्रेणीं प्राप्य राघव ।के चरण-कमलकी विशुद्ध भक्तिरूप सीढ़ी पाकर ज्ञान-
इच्छामि ज्ञानयोगारूढं सौधमारोढुमीश्वर ॥३१॥योग नामक राजभवनके शिखरपर चढ़ना चाहता हूँ ॥ ३१ ॥ हे कारुणिकश्रेष्ठ सीताफ्ते राम ! आपको
नमः सीतापते राम नमः कारुणिकोत्तम ।नमस्कार है; हे रावणारे ! आपको बारम्बार नमस्कार
रावणारे नमस्तुभ्यं त्राहि मां भवसागरात् ॥३२॥है; आप इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये” ॥ ३२ ॥

* प्रकृतिरूपा पत्नीके साथ भगवान्का अनादि सम्बन्ध है, इसलिये वे अनादि गृहस्थ हैं ।