अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ३ ]
युद्धकाण्डम्
२४३
| त्रैलोक्यगुरवेऽनादिगृहस्थाय नमोनमः ॥१९॥ | के गुरु और अनादिकालीन गृहस्थ* हैं उन महात्मा रामको बारम्बार नमस्कार है ॥ १९ ॥ हे राम ! आप |
| त्वमादिर्जगतां राम त्वमेव स्थितिकारणम् । | संसारकी उत्पत्ति और स्थितिके कारण हैं तथा अन्तमें- |
| त्वमन्ते निधनस्थानं स्वेच्छाचारस्त्वमेव हि ॥२०॥ | आप ही उसके लयस्थान हैं; आप अपनी इच्छानुसार विहार करनेवाले हैं ॥ २० ॥ हे राघव ! चराचर भूतों- |
| चराचराणां भूतानां बहिरन्तश्च राघव । | के भीतर और बाहर व्याप्य-व्यापक-रूपसे आप विश्वरूप |
| व्याप्यव्यापकरूपेण भवान् भाति जगन्मयः ॥२१॥ | ही भास रहे हैं ॥ २१ ॥ आपकी मायाने जिनका |
| त्वन्मायया हृतज्ञाना नष्टात्मानो विचेतसः। | सदसद्विवेक हर लिया है वे नष्ट-बुद्धि मूढ़ पुरुष अपने पाप-पुण्यके वशीभूत होकर संसारमें बारम्बार आते- |
| गतागतं प्रपद्यन्ते पापपुण्यवशात्सदा ॥२२॥ | जाते रहते हैं ॥ २२ ॥ जबतक मनुष्य एकाग्र |
| तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा । | चित्तसे आपके ज्ञानस्वरूपको नहीं जानता तभीतक |
| यावन्न ज्ञायते ज्ञानं चेतसाऽनन्यगामिना ॥२३॥ | सीपीमें चाँदीके समान यह संसार सत्य प्रतीत होता है ॥ २३ ॥ हे विभो ! आपको न जाननेसे ही लोग पुत्र, स्त्री |
| त्वदज्ञानात्सदा युक्ताः पुत्रदारगृहादिषु । | और गृह आदिमें आसक्त होकर अन्तमें दुःख देनेवाले |
| रमन्ते विषयान्सर्वानन्ते दुःखप्रदान्विभो ॥२४॥ | विषयोंमें सुख मानते हैं ॥ २४ ॥ हे पुरुषोत्तम ! आप ही इन्द्र, अग्नि, यम, निर्ऋति, वरुण और वायु हैं तथा आप |
| त्वमिन्द्रोऽग्निर्यमो रक्षो वरुणश्च तथानिलः । | ही कुबेर और रुद्र हैं ॥ २५ ॥ हे प्रभो ! आप अणु-से- |
| कुबेरश्च तथा रुद्रस्त्वमेव पुरुषोत्तम ॥२५॥ | अणु और महान्-से-महान् हैं तथा आप ही समस्त लोकोंके पिता, माता और धाता (धारण-पोषण करनेवाले) हैं |
| त्वमणोरप्यणीयांश्च स्थूलात् स्थूलतरः प्रभो । | ॥ २६ ॥ आप आदि, मध्य और अन्तसे रहित सर्वत्र परिपूर्ण |
| त्वं पिता सर्वलोकानां माता धाता त्वमेव हि ॥२६॥ | अच्युत और अविनाशी हैं । आप हाथ-पाँवसे रहित तथा नेत्र और कर्णहीन हैं ॥ २७ ॥ तथापि हे |
| आदिमध्यान्तरहितः परिपूर्णोऽच्युतोऽव्ययः । | खरान्तक ! आप सब कुछ देखनेवाले, सब कुछ सुनने- |
| त्वं पाणिपादरहितश्चक्षुःश्रोत्रविवर्जितः ॥२७॥ | वाले, सब कुछ ग्रहण करनेवाले और बड़े वेगवान् हैं । हे प्रभो ! आप अन्नमय आदि पाँचों कोशोंसे रहित तथा |
| श्रोता द्रष्टा ग्रहीता च जवनस्त्वं खरान्तक । | निर्गुण और निराश्रय हैं ॥ २८ ॥ आप निर्विकल्प, |
| कोशेभ्यो व्यतिरिक्तस्त्वं निर्गुणो निरूपाश्रयः ॥२८॥ | निर्विकार और निराकार हैं, आपका कोई प्रेरक नहीं |
| निर्विकल्पो निर्विकारो निराकारो निरीश्वरः । | है, आप (उत्पत्ति, वृद्धि, परिणाम, क्षय, जीर्णता और नाश—इन) छः भाव-विकारोंसे रहित हैं तथा |
| षड्भावरहितोऽनादिः पुरुषः प्रकृतेः परः ॥२९॥ | प्रकृतिसे अतीत अनादि पुरुष हैं ॥ २९ ॥ मायाके |
| मायया गृह्यमाणस्त्वं मनुष्य इव भाव्यसे । | कारण ही आप साधारण मनुष्यके समान प्रतीत होते हैं; वैष्णवजन आपको निर्गुण और अजन्मा जानकर मोक्ष |
| ज्ञात्वा त्वां निर्गुणमजं वैष्णवा मोक्षगामिनः ॥३०॥ | प्राप्त करते हैं ॥ ३० ॥ हे राघव ! हे प्रभो ! मैं आप- |
| अहं त्वत्पादसद्भक्तिनिःश्रेणीं प्राप्य राघव । | के चरण-कमलकी विशुद्ध भक्तिरूप सीढ़ी पाकर ज्ञान- |
| इच्छामि ज्ञानयोगारूढं सौधमारोढुमीश्वर ॥३१॥ | योग नामक राजभवनके शिखरपर चढ़ना चाहता हूँ ॥ ३१ ॥ हे कारुणिकश्रेष्ठ सीताफ्ते राम ! आपको |
| नमः सीतापते राम नमः कारुणिकोत्तम । | नमस्कार है; हे रावणारे ! आपको बारम्बार नमस्कार |
| रावणारे नमस्तुभ्यं त्राहि मां भवसागरात् ॥३२॥ | है; आप इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये” ॥ ३२ ॥ |
* प्रकृतिरूपा पत्नीके साथ भगवान्का अनादि सम्बन्ध है, इसलिये वे अनादि गृहस्थ हैं ।