अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ३ ] युद्धकाण्ड २४७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| त्राहि त्राहि जगन्नाथ राम त्रैलोक्यरक्षक ॥७०॥<br><br>जडोऽहं राम ते सृष्टः सृजता निखिलं जगत् ।<br>स्वभावमन्यथा कर्तुं कः शक्तो देवनिर्मितम् ॥७१॥<br><br>स्थूलानि पञ्चभूतानि जडान्येव स्वभावतः ।<br>कृतानि भवतैतानि त्वदाज्ञां लङ्घयन्ति न ॥७२॥<br><br>तामसादहमो राम भूतानि प्रभवन्ति हि ।<br>कारणानुगमात्तेषां जडत्वं तामसं स्वतः ॥७३॥<br><br>निर्गुणस्त्वं निराकारो यदा मायागुणान्प्रभो ।<br>लीलयाङ्गीकरोषि त्वं तदा वैराजनामवान् ॥७४॥<br><br>गुणात्मनो विराजश्च सत्त्वाद्देवा बभूविरे ।<br>रजोगुणात्प्रजेशाद्या मन्योर्भूतपतिस्तव ॥७५॥<br><br>त्वामहं मायया छन्नं लीलया मानुषाकृतिम् ॥७६॥<br><br>जडबुद्धिर्जडो मूर्खः कथं जानामि निर्गुणम् ।<br>दण्ड एव हि मूर्खाणां सन्मार्गप्रापकः प्रभो ॥७७॥<br><br>भूतानाममरश्रेष्ठ पशूनां लगुडो यथा ।<br>शरणं ते व्रजामीश शरण्यं भक्तवत्सल ।<br>अभयं देहि मे राम लङ्कामार्गं ददामि ते ॥७८॥ | हो रहे हैं उन रघुनाथजीको साष्टाङ्ग दण्डवत् कर बोला—"हे त्रैलोक्यरक्षक जगत्पति राम ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो ॥ ६८-७० ॥ हे राम ! सम्पूर्ण संसारकी रचना करते समय आपने मुझे जड ही बनाया था; फिर आपके बनाये स्वभावको कोई कैसे बदल सकता है ? ॥ ७१ ॥ पाँचों स्थूल भूतोंको आपने स्वभावसे जड ही बनाया है, वे आपकी आज्ञाका उल्लङ्घन नहीं कर सकते ॥ ७२ ॥ हे राम ! भूत तामस अहंकारसे उत्पन्न होते हैं, अतः अपने कारणका अनुगमन करनेसे उनमें तमोरूप जडत्व तो स्वतःसिद्ध है ॥ ७३ ॥ हे प्रभो ! आप निर्गुण और निराकार हैं। जिस समय आप लीलासे ही मायिक गुणोंको अङ्गीकार करते हैं उस समय आपका नाम 'वैराज' पड़ जाता है ॥ ७४ ॥ उस गुणमय विराट्के सात्त्विकांशसे देवगण, राजसांशसे प्रजापतिगण और तामसांशसे रुद्रगण उत्पन्न होते हैं। ॥ ७५ ॥ हे नाथ ! लीलावश मायासे आच्छन्न होकर मनुष्यरूप हुए आप निर्गुण परमात्माको मैं जडबुद्धि मूर्ख कैसे जान सकता हूँ ? हे अमरश्रेष्ठ प्रभो ! पशुओंको जैसे लाठी ठीक-ठीक मार्गमें ले जाती है उसी प्रकार (मुझ-जैसे) मूर्ख जीवोंके लिये तो दण्ड ही सन्मार्गपर लानेवाला होता है। हे भक्तवत्सल भगवान् राम ! आप शरणागतरक्षककी मैं शरण हूँ। आप मुझे अभयदान दीजिये। मैं आपको लंकामें जानेका मार्ग दूँगा" ॥ ७६-७८ ॥ |
| श्रीराम उवाच<br>अमोघोऽयं महाबाणः कस्मिन्देशे निपात्यताम्।<br>लक्ष्यं दर्शय मे शीघ्रं बाणस्यामोघपातिनः ॥७९॥ | **श्रीरामचन्द्रजी बोले—**मेरा यह महाबाण व्यर्थ जानेवाला नहीं है; अतः शीघ्र ही मुझे इस अमोघ बाणका लक्ष्य बताओ । ॥ ७९ ॥ |
| रामस्य वचनं श्रुत्वा करे दृष्ट्वा महाशरम् ।<br>महोदधिर्महातेजा राघवं वाक्यमब्रवीत् ॥८०॥<br><br>रामोत्तरप्रदेशे तु द्रुमकुल्य इति श्रुतः ।<br>प्रदेशस्तत्र बहवः पापात्मानो दिवानिशम् ॥८१॥<br><br>बाधन्ते मां रघुश्रेष्ठ तत्र ते पात्यतां शरः ।<br>रामेण सृष्टो बाणस्तु क्षणादाभीरमण्डलम् ॥८२॥<br><br>हत्वा पुनः समागत्य तूणीरे पूर्ववत्स्थितः । | रामका यह वचन सुनकर और उनके हाथमें वह महाबाण देखकर महातेजस्वी समुद्रने रघुनाथजीसे कहा—॥ ८० ॥ "हे राम ! उत्तरकी ओर एक 'द्रुमकुल्य' नामक देश है। वहाँ बहुत-से पापी रहते हैं। वे मुझे रात-दिन पीड़ा पहुँचाते हैं। हे रघुश्रेष्ठ ! आप अपना यह बाण वहीं गिराइये।" तदनन्तर रामका छोड़ा हुआ वह बाण एक क्षणमें ही समस्त आभीरमण्डलको मारकर फिर पूर्ववत् तरकशमें लौट आया। तब समुद्रने रघुनाथजीसे अति विनीत भावसे कहा— |