भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 423 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 280

सर्ग ४ ] युद्धकाण्ड २५१


वानराणां वर्णने वा सङ्ख्याने वा क ईश्वरः ।
शूराः सर्वे महाकायाः सर्वे युद्धाभिकाङ्क्षिणः ॥३६॥

शक्ताः सर्वे चूर्णयितुं लङ्कां रक्षोगणैः सह ।
एतेषां बलसङ्ख्यानं प्रत्येकं वच्मि ते शृणु ॥३७॥

एषां कोटिसहस्राणि नव पञ्च च सप्त च ।
तथा शङ्खसहस्राणि तथार्बुदशतानि च ॥३८॥

सुग्रीवसचिवानां ते बलमेतत्प्रकीर्तितम् ।
अन्येषां तु बलं नाहं वक्तुं शक्तोऽस्मि रावण ॥३९॥

रामो न मानुषः साक्षादादिनारायणः परः ।
सीता साक्षाज्जगद्धेतुश्चिच्छक्तिर्जगदात्मिका ॥४०॥

ताभ्यामेव समुत्पन्नं जगत्स्थावरजङ्गमम् ।
तस्माद्रामश्च सीता च जगतस्तस्थुषश्च तौ ॥४१॥

पितरौ पृथिवीपाल तयोर्वैरी कथं भवेत् ।
अज्ञानता त्वयाऽऽनीता जगन्मातैव जानकी ॥४२॥

क्षणनाशिनि संसारे शरीरे क्षणभङ्गुंरे ।
पञ्चभूतात्मके राजंश्चतुर्विंशतितत्त्वके ॥४३॥

मलमांसास्थिदुर्गन्धभूयिष्ठेऽहङ्कृतालये ।
कैवास्था व्यतिरिक्तस्य काये तव जडात्मके ॥४४॥

यत्कृते ब्रह्महत्यादिपातकानि कृतानि ते ।
भोगभोक्ता तु यो देहः स देहोऽत्र पतिष्यति ॥४५॥

पुण्यपापे समायातो जीवेन सुखदुःखयोः ।
कारणे देहयोगादिनाऽऽत्मनः कुरुतोऽनिशम् ॥४६॥

यावद्देहोऽस्मि कर्तास्मीत्यात्माऽहङ्कुरुतेऽवशः ।
अध्यासात्तावदेव स्याज्जन्मनाशादिसम्भवः ॥४७॥


इन वानरोंका वर्णन करने और गिननेकी सामर्थ्य किसमें है। ये सभी बड़े शूरवीर, विशालकाय और युद्धके लिये उत्सुक हैं ॥३६॥ राक्षसोंके सहित लंकाको चूर्ण करनेमें ये सभी समर्थ हैं। अब मैं इनमेंसे प्रत्येककी सेनाकी संख्या बतलाता हूँ, सावधान होकर सुनिये ॥ ३७ ॥ इनमेंसे प्रत्येकके नीचे इक्कीस हजार करोड़, हजारों शंख और सैकड़ों अरब सेना है॥३८॥

"हे रावण ! यह तो मैंने सुग्रीवके मन्त्रियोंकी ही सेना बतायी है; उनके अतिरिक्त औरोंकी सेना गिनानेमें तो मैं सर्वथा असमर्थ हूँ ॥ ३९ ॥ राम भी कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं, वे साक्षात् आदिनारायण परमात्मा हैं; और सीताजी जगत्की कारणरूपा साक्षात् जगद्रूपिणी चित्-शक्ति हैं ॥ ४० ॥ इन दोनोंसे ही समस्त स्थावर-जंगम संसार उत्पन्न हुआ है, अतः राम और सीता स्थावर-जंगम जगत्के माता-पिता हैं। हे पृथिवीपते ! सोचो तो, उनका वैरी कोई कैसे हो सकता है ? आप जिस जानकीको अनजानमें ले आये हैं वह साक्षात् जगन्माता ही हैं ॥४१-४२॥ हे राजन् ! क्षण-क्षणमें नष्ट होनेवाले संसारमें चौबीस तत्त्वों*के समूहरूप इस क्षणभंगुर पाञ्चभौतिक शरीरमें जिसमें मल, मांस, अस्थि आदि दुर्गन्धयुक्त पदार्थोंकी ही अधिकता है और जो अहंकारका आश्रय-स्थान तथा जडरूप है आप क्या आस्था करते हैं ? आप तो इससे सर्वथा पृथक् हैं ॥ ४३-४४॥ हाय ! जिस शरीरके लिये आपने ब्रह्महत्यादि अनेकों पाप किये हैं, सम्पूर्ण भोगोंका भोक्ता वह शरीर तो यहीं पड़ा रह जायगा ! ॥ ४५ ॥ सुख-दुःखके कारणरूप (पूर्वजन्मकृत) पाप-पुण्य जीवके साथ ही आते हैं और वे ही देह-सम्बन्ध आदिके द्वारा जीवको अहर्निश सुख-दुःखकी प्राप्ति कराते हैं ॥ ४६ ॥ जबतक अज्ञानजन्य अध्यासके कारण जीव 'मैं देह हूँ, मैं कर्त्ता हूँ' ऐसा अभिमान करता है तभीतक उसे विवश होकर जन्म-मृत्यु आदि भोगने पड़ते हैं


* प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पञ्चभूत और शब्द-स्पर्शा आदि उनके पाँच विषय—ये सब मिलाकर चौबीस तत्त्व कहलाते हैं ।