अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| सर्ग ५ ] | युद्धकाण्ड | २५३ |
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पञ्चम सर्ग
शुकका पूर्व-चरित्र, माल्यवान्का रावणको समझाना तथा वानर-राक्षस-संग्राम ।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! शुकके मुखसे निकले हुए इन अज्ञाननाशक वचनोंको सुनकर रावण क्रोधसे मानो जलता हुआ उससे आँखें लाल करके बोला—॥१॥ “अरे दुर्बुद्धे ! मेरे ही टुकड़ोंसे पलकर तू इस प्रकार गुरुकी भाँति कैसे बोलता है ? तीनों लोकोंका शासन करनेवाला तो मैं हूँ, मुझे उपदेश देते हुए तुझको लज्जा नहीं आती ? ॥ २ ॥ तू यद्यपि वध करनेयोग्य है और मैं तुझे अभी मार डालता, परन्तु तेरे पूर्व-कृत्योंको याद करके मैं तुझे छोड़े देता हूँ ॥ ३ ॥ अरे मूढ़ ! तू तुरन्त यहाँसे टल जा, मैं ऐसी बातें नहीं सुनना चाहता ।” रावणके ये वचन सुनकर शुक 'महाराजकी बड़ी कृपा है' ऐसा कहकर काँपता हुआ अपने घर चला गया ॥ ४ ॥ |
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| श्रुत्वा शुकमुखोद्गीतं वाक्यमज्ञाननाशनम् ।<br>रावणः क्रोधताम्राक्षो दहन्निव तमब्रवीत् ॥ १ ॥ | |
| अनुजीव्य सुदुर्बुद्धे गुरुवद्भाषसे कथम् ।<br>शासिताऽहं त्रिजगतां त्वं मां शिक्षन्न लज्जसे ॥ २ ॥ | |
| इदानीमेव हन्मि त्वां किन्तु पूर्वकृतं तव ।<br>स्मरामि तेन रक्षामि त्वां यद्यपि वधोचितम् ॥ ३ ॥ | |
| इतो गच्छ विमूढ त्वमेवं श्रोतुं न मे क्षमम् ।<br>महाप्रसाद इत्युक्त्वा वेपमानो गृहं ययौ ॥ ४ ॥ | |
| शुकोऽपि ब्राह्मणः पूर्वं ब्रह्मिष्ठो ब्रह्मवित्तमः।<br>वानप्रस्थविधानेन वने तिष्ठन् स्वकर्मकृत् ॥ ५ ॥ | पूर्व-जन्ममें शुक एक वेदज्ञ और ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण था, तथा वानप्रस्थ-विधिसे अपने धर्म-कर्ममें तत्पर हुआ वनमें रहता था ॥ ५ ॥ इस महामतिने देवताओंकी वृद्धि और दैत्योंके नाशके लिये लगातार बहुत-से बड़े-बड़े यज्ञ किये ॥ ६ ॥ अतः देवताओंके हितमें लगे रहने-के कारण शुकका राक्षसोंसे विरोध हो गया । उस समय वज्रदंष्ट्र नामक एक महान् राक्षस शुकका अपकार करनेपर उतारू होकर अवसर देखने लगा । |
| देवानांमभिवृद्ध्यर्थं विनाशाय सुरद्विषाम् ।<br>चकार यज्ञविततिमाविच्छिन्नां महामतिः ॥ ६ ॥ | |
| राक्षसानां विरोधोऽभूच्छुको देवहितोद्यतः ।<br>वज्रदंष्ट्र इति ख्यातस्तत्रैको राक्षसो महान् ॥ ७ ॥ | |
| अन्तरं प्रेप्सुरतिष्ठच्छुकापकरणोद्यतः ।<br>कदाचिदागतोऽगस्त्यस्तस्याश्रमपदं मुनेः ॥ ८ ॥ | एक दिन मुनिवर शुकके आश्रममें महर्षि अगस्त्य पधारे ॥७-८॥ शुकने अगस्त्यजीकी पूजा कर उन्हें भोजन के लिये निमन्त्रित किया । जिस समय महर्षि अगस्त्य स्नानके लिये गये हुए थे उस राक्षस (वज्रदंष्ट्र) ने अपना मौका देखकर अगस्त्यका रूप बनाया और शुकसे कहा—"हे ब्रह्मन् ! यदि तुम मुझे भोजन कराना चाहते हो तो मांसयुक्त अन्न खिलाओ ॥ ९-१० ॥ मैंने बहुत दिनोंसे छाग (बकरे) का मांस नहीं खाया है ।” तब शुकने 'जो आज्ञा' कह बड़ी तैयारीसे मांसमय भोजन बनवाया ॥ ११ ॥ |
| तेन सम्पूजितोऽगस्त्यो भोजनार्थं निमन्त्रितः ।<br>गते स्नातुं मुनौ कुम्भसम्भवे प्राप्य चान्तरम् ॥ ९॥ | |
| अगस्त्यरूपधृक् सोऽपि राक्षसः शुकमब्रवीत् ।<br>यदि दास्यसि मे ब्रह्मन् भोजनं देहि सामिषम् ॥१०॥ | |
| बहुकालं न भुक्तं मे मांसं छागाङ्गसम्भवम् ।<br>तथेति कारयामास मांसभोज्यं सविस्तरम् ॥ ११॥ |