अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ७ ] युद्धकाण्ड २६९
| विवोध्य कुम्भश्रवणं निन्यू रावणसन्निधिम् ।<br>नमस्कृत्य स राजानमासनोपरि संस्थितः ॥५०॥ | रावणके पास ले आये । वहाँ पहुँचनेपर वह राजाको प्रणाम कर आसनपर बैठ गया ॥४९-५०॥ |
| तमाह रावणो राजा भ्रातरं दीनया गिरा ।<br>कुम्भकर्ण निबोध त्वं महत्कष्टमुपस्थितम् ॥५१॥ | तब राजा रावणने अत्यन्त दीन-वाणीसे उस अपने भाईसे कहा—"कुम्भकर्ण ! इस समय हमारे ऊपर बड़ा संकट है, सो तुम सुनो ॥ ५१ ॥ |
| रणे निहताः शूराः पुत्राः पौत्राश्च बान्धवाः ।<br>किं कर्तव्यमिदानीं मे मृत्युकाल उपस्थिते ॥५२॥ | रामने हमारे बड़े-बड़े वीर, पुत्र, पौत्र और बन्धु-बान्धवगण मार डाले हैं। भाई, इस समय मेरा मृत्युकाल आ गया है, अब मुझे क्या करना चाहिये ॥ ५२ ॥ |
| एष दाशरथी रामः सुग्रीवसहितो बली ।<br>समुद्रं सबलस्तीर्त्वा मूलं नः परिकृन्तति ॥५३॥ | यह महाबली दशरथकुमार राम सुग्रीवके सहित दलबलके साथ समुद्र पारकर सब ओरसे हमारी जड़ काट रहा है ॥ ५३ ॥ |
| ये राक्षसा मुख्यतमास्ते हता वानरैर्युधि ।<br>वानराणां क्षयं युद्धे न पश्यामि कदाचन ॥५४॥ | हमारे जो मुख्य-मुख्य राक्षस थे वे सब युद्धमें वानरोंके हाथसे मारे गये, किन्तु इस युद्धमें हमें वानरोंका क्षय होता कभी दिखायी नहीं देता ॥ ५४ ॥ |
| नाशयस्व महाबाहो यदर्थं परिबोधितः ।<br>भ्रातुरर्थे महासत्त्व कुरु कर्म सुदुष्करम् ॥५५॥ | हे महाबाहो ! तुम इनका नाश करो, मैंने इसीलिये तुम्हें जगाया है । हे महावीर ! अपने भाईके लिये इस दुष्कर कार्यको करो" ॥ ५५ ॥ |
| श्रुत्वा तद्रावणेन्द्रस्य वचनं परिदेवितम् ।<br>कुम्भकर्णो जहासोच्चैर्वचनं चेदमब्रवीत् ॥५६॥ | राजा रावणके ये दुःखमय वचन सुनकर कुम्भकर्ण बड़े जोरसे ठट्ठा मारकर हँसा और इस प्रकार कहने लगा—॥५६॥ |
| पुरा मन्त्रविचारे ते गदितं यन्मया नृप ।<br>तदद्य त्वामुपगतं फलं पापस्य कर्मणः ॥५७॥ | "राजन् ! आपने जब पहले सम्मतिकी थी उस समय मैंने जो कुछ कहा था आपके पापका वह फल आज उपस्थित हो ही गया ॥ ५७ ॥ |
| पूर्वमेव मया प्रोक्तो रामो नारायणः परः ।<br>सीता च योगमायेति बोधितोऽपि न बुध्यसे ॥५८॥ | मैंने तो आपसे पहले ही कहा था कि राम साक्षात् परब्रह्म नारायण हैं और सीताजी योगमाया हैं, किन्तु आप तो समझानेपर भी नहीं समझते ॥ ५८ ॥ |
| एकदाऽहं वने सानौ विशालायां स्थितो निशि ।<br>दृष्टो मया मुनिः साक्षान्नारदो दिव्यदर्शनः ॥५९॥ | एक दिन मैं रात्रिके समय वनमें एक विशाल शिलापर बैठा था । इसी समय मैंने दिव्यमूर्ति साक्षात् नारद मुनिको देखा ॥ ५९ ॥ |
| तमब्रुवं महाभाग कुतो गन्तासि मे वद ।<br>इत्युक्तो नारदः प्राह देवानां मन्त्रणे स्थितः ॥६०॥ | उन्हें देखकर मैंने कहा—"हे महाभाग ! कहिये, इस समय आप कहाँ जा रहे हैं ।" मेरे इस प्रकार पूछनेपर नारदजीने कहा—"मैं अभीतक देवताओं- |
| तत्रोत्पन्नमुदन्तं ते वक्ष्यामि शृणु तत्त्वतः ।<br>युवाभ्यां पीडिता देवाः सर्वे विष्णुमुपागताः ॥६१॥ | की एक गुप्त गोष्ठीमें था ॥ ६० ॥ वहाँ जो कुछ हुआ वह मैं तुम्हें ज्यों-का-त्यों सुनाता हूँ । तुम दोनों भाइयोंसे अत्यन्त पीड़ित होकर समस्त देवगण विष्णु- |
| ऊचुस्ते देवदेवेशं स्तुत्वा भक्त्या समाहिताः ।<br>जहि रावणमक्षोभ्यं देव त्रैलोक्यकण्टकम् ॥ ६२ ॥ | भगवान्के पास गये ॥ ६१ ॥ और उन देवदेवेश्वरकी अत्यन्त भक्ति और एकाग्रतासे स्तुति कर कहने लगे- |