अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ८ ] युद्धकाण्ड २७१
त्वमानीतो न मे ज्ञानबोधनाय सुबुद्धिमान् ।
मया कृतं समीकृत्य युध्यस्व यदि रोचते ॥ २ ॥
नोचेद्गच्छ सुषुप्त्यर्थं निद्रा त्वां बाधतेऽधुना ।
रावणस्य वचः श्रुत्वा कुम्भकर्णो महाबलः ॥ ३ ॥
रूष्टोऽयमिति विज्ञाय तूर्णं युद्धाय निर्ययौ ।
स लङ्घयित्वा प्राकारं महापर्वतसन्निभः ॥ ४ ॥
निर्ययौ नगरात्तूर्णं भीपयन्हरिसैनिकान् ।
स ननाद महानादं समुद्रमभिनादयन् ॥ ५ ॥
वानरान्कालयामास बाहुभ्यां भक्षयन् रुषा ।
कुम्भकर्णं तदा दृष्ट्वा सपक्षमिव पर्वतम् ॥ ६ ॥
दुद्रुवुर्वानराः सर्वे कालान्तकमिवाखिलाः ।
भ्रमन्तं हरिवाहिन्यां मुद्गरेण महाबलम् ॥ ७ ॥
दलयन्तं हरीन्वेगाद्भक्षयन्तं समन्ततः ।
चूर्णयन्तं मुद्गरेण पाणिपादैरनेकधा ॥ ८ ॥
कुम्भकर्णं तदा दृष्ट्वा गदापाणिर्विभीषणः ।
ननाम चरणं तस्य भ्रातुर्ज्येष्ठस्य बुद्धिमान् ॥ ९ ॥
विभीषणोऽहं भ्रातुर्मे दयां कुरु महामते ।
रावणस्तु मया भ्रातर्बहुधा परिबोधितः ॥१०॥
सीतां देहीति रामाय रामः साक्षाज्जनार्दनः ।
न शृणोति च मां हन्तुं खड्गमुद्यम्य चोक्तवान् ॥११॥
धिक् त्वां गच्छेति मां हत्वा पदा पापिर्भिरावृतः ।
चतुर्भिर्मन्त्रिभिः सार्धं रामं शरणमागतः ॥१२॥
तच्छ्रुत्वा कुम्भकर्णोऽपि ज्ञात्वा भ्रातरमागतम् ।
समालिङ्ग्य च वत्स त्वं जीव रामपदाश्रयात् ॥१३॥
कुलसंरक्षणार्थाय राक्षसानां हिताय च ।
बुद्धिमान् हो, किन्तु इस समय मैंने तुम्हें ज्ञानोपदेश करनेके लिये नहीं बुलाया है। यदि तुम्हें अच्छा लगे तो मेरे कृत्यको ठीक मानकर युद्ध करो ॥२॥ नहीं तो जाओ शयन करो; तुम्हें इस समय नींद सता रही होगी।''
रावणके ये वचन सुनकर महाबली कुम्भकर्ण, यह जानकर कि रावण रुष्ट हो गया है, तुरन्त युद्धके लिये चल पड़ा। वह महापर्वतके समान विशालकाय राक्षस नगरके परकोटेको लाँघकर बाहर आया (क्योंकि अत्यन्त दीर्घकाय होनेके कारण वह नगरके संकुचित द्वारोंमें होकर नहीं निकल सकता था।) और सम्पूर्ण वानर सैनिकोंको भयभीत करते हुए उसने बड़ा घोर शब्द किया, जिससे समुद्र भी गूँज उठा ॥ ३-५ ॥
फिर वह अत्यन्त क्रुद्ध हो अपनी भुजाओंसे वानरोंको निगल-निगलकर नष्ट करने लगा। तब तो जिस प्रकार समस्त प्राणी यमराजको देखकर भागते हैं उसी प्रकार सपक्ष पर्वतके समान विशालकाय कुम्भकर्णको देखकर समस्त वानरगण भागने लगे।
इसी समय, महाबली कुम्भकर्णको मुद्गर धारण कर वानर-सेनामें घूमते, ठौर-ठौर वानरोंको मारते, उन्हें अत्यन्त वेगसे भक्षण करते और अपने मुद्गर तथा लात और घूसोंसे नाना प्रकार कुचलते देख परम बुद्धिमान् गदापाणि विभीषणने उस अपने ज्येष्ठ भ्राताके चरणोंमें प्रणाम किया ॥६-९॥ और कहा-'हे महामते! मैं आपका भाई विभीषण हूँ, आप मुझपर दया करें। भाई, मैंने रावणको बारम्बार समझाया कि राम साक्षात् विष्णुभगवान् हैं, तुम उन्हें सीताजीको सौंप दो, किन्तु उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी और मुझे मारनेके लिये तलवार खींचकर कहा कि 'तुझे धिक्कार है, तू यहाँसे टल जा'। पापी मन्त्रियोंसे घिरे हुए भाई रावणने ऐसा कहकर मेरे लात मारी। तब मैं अपने चार मन्त्रियोंके सहित भगवान् रामकी शरणमें चला आया'' ॥ १०-१२ ॥
ऐसा सुन कुम्भकर्णने भी अपने भाईको आया जान उन्हें हृदयसे लगाया और कहा-''वत्स ! भगवान् रामके चरणका आश्रय पाकर अपने कुलकी रक्षा और राक्षसोंके कल्याणके लिये तुम चिरकालतक