भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ५ ] : उत्तरकाण्ड ३५१


शिष्यैः श्रुत्वा च वाल्मीकिः सीतां ज्ञात्वा स दिव्यदृक्।<br>अर्घ्यादिभिः पूजयित्वा समाश्वास्य च जानकीम् ।<br>ज्ञात्वा भविष्यं सकलमार्पयन्मुनियोषितम् ॥६१॥मूर्खा स्त्रियोंके समान विलाप करने लगीं। महर्षि वाल्मीकिने जब शिष्योंके मुखसे यह बात सुनी (कि एक स्त्री रो रही है) तो उन्होंने दिव्यदृष्टिसे जान लिया कि वह सीताजी ही हैं ॥६०॥ मुनि भविष्यमें होनेवाली सब बातें जानते थे। अतः उन्होंने अर्ध्यादिसे सीताजीका पूजन किया और उन्हें समझा-बुझाकर मुनिपत्नियोंको सौंप दिया ॥६१॥ वे मुनि-पत्नियाँ मुनीश्वरके कहनेसे उन्हें साक्षात् परमात्माकी भार्या लक्ष्मीजी जानकर नित्यप्रति भक्ति-भावसे उनकी पूजा करतीं और सदा ही अत्यन्त आदरसे नम्रतापूर्वक उनकी सेवा करती थीं ॥६२॥ इधर, सीताजीको त्याग देनेपर, जिनके चरणकमलोंका मुनिजन सेवन करते हैं वे विज्ञानचक्षु, अद्वितीय, आदिदेव परमात्मा राम भी समस्त भोगोंको छोड़कर वैराग्यपूर्वक मुनियोंके समान रहने लगे ॥६३॥
तास्तां सम्पूजयन्ति स्म सीतां भक्त्या दिने दिने ।<br>ज्ञात्वा परात्मनो लक्ष्मीं मुनिवाक्येन योषितः ।<br>सेवा चक्रुः सदा तस्या विनयादिभिरादरात् ॥६२॥
रामोऽपि सीतारहितः परात्मा<br>विज्ञानदृक्केवल आदिदेवः ।<br>सन्त्यज्य भोगानखिलान्विरक्तो<br>मुनिव्रतोऽभून्मुनिसेविताङ्घ्रिः ॥६३॥

इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
उत्तरकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चम सर्ग

रामगीता।

श्रीमहादेव उवाच<br>ततो जगन्मङ्गलमङ्गलात्मना<br>विधाय रामायणकीर्त्तिमुत्तमाम् ।<br>चचार पूर्वाचरितं रघूत्तमो<br>राजर्षिचर्यैरभिसेवितं यथा ॥ १ ॥श्रीमहादेवजी बोले- हे पार्वती! तदनन्तर, रघुश्रेष्ठ भगवान् राम, संसारके मङ्गलके लिये धारण किये अपने दिव्यमङ्गल देहसे रामायणरूप अति उत्तमकीर्तिकी स्थापना कर पूर्वकालमें जैसा आचरण राजर्षिश्रेष्ठोंने किया है वैसा ही स्वयं भी करने लगे ॥१॥
सौमित्रिणा पृष्ट उदारबुद्धिना<br>रामः कथाः प्राह पुरातनीः शुभाः ।<br>राज्ञः प्रमत्तस्य नृगस्य शापतो<br>द्विजस्य तिर्यक्त्वमथाह राघवः ॥ २ ॥उदारबुद्धि लक्ष्मणजीके पूछनेपर वे प्राचीन उत्तम कथाएँ सुनाया करते थे। इसी प्रसंगमें श्रीरघुनाथजीने, राजा नृगको प्रमादवश ब्राह्मणके शापसे तिर्यग्योनि प्राप्त होनेका वृत्तान्त भी सुनाया ॥ २ ॥
कदाचिदेकान्त उपस्थितं प्रभुं<br>रामं रमालालितपादपङ्कजम् ।<br>सौमित्रिरासादितशुद्धभावनः<br>प्रणम्य भक्त्या विनयान्वितोऽब्रवीत् ॥ ३ ॥किसी दिन, भगवान् राम, जिनके चरणकमलोंकी सेवा साक्षात् श्रीलक्ष्मीजी करती हैं, एकान्तमें बैठे हुए थे। उस समय शुद्ध विचारवाले लक्ष्मणजीने (उनके पास जा) उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणाम कर अति विनीतभावसे कहा- ॥ ३ ॥ "हे महामते! आप शुद्धज्ञानस्वरूप, समस्त-