भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३५८ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ५


एवं सदात्मानमखण्डितात्मना
विचारमाणस्य विशुद्धभावना ।
हन्यादविद्यामचिरेण कारकै
रसायनं यद्वदुपासितं रुजः ॥ ४५ ॥

अर्थ: इस प्रकार सदा आत्माका अखण्ड-वृत्तिसे चिन्तन करनेवाले पुरुषके अन्तःकरणमें उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरन्त ही कारकादिके सहित अविद्याका नाश कर देती है, जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई ओषधि रोगको नष्ट कर डालती है ॥ ४५ ॥


विविक्त आसीन उपारतेन्द्रियो
विनिर्जितात्मा विमलान्तराशयः ।
विभावयेदेकमनन्यसाधनो
विज्ञानदृक्केवल आत्मसंस्थितः ॥ ४६ ॥

अर्थ: (आत्मचिन्तन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि) एकान्त देशमें इन्द्रियोंको उनके विषयोंसे हटाकर और अन्तःकरणको अपने अधीन करके बैठे तथा आत्मामें स्थित होकर और किसी साधनका आश्रय न लेकर शुद्ध-चित्त हुआ केवल ज्ञानदृष्टिद्वारा एक आत्माकी ही भावना करे ॥ ४६ ॥


विश्वं यदेतत्परमात्मदर्शनं
विलापयेदात्मनि सर्वकारणे ।
पूर्णश्चिदानन्दमयोऽवतिष्ठते
न वेद बाह्यं न च किञ्चिदान्तरम् ॥ ४७ ॥

अर्थ: यह विश्व परमात्मस्वरूप है ऐसा समझकर इसे सबके कारणरूप आत्मामें लीन करे; इस प्रकार जो पूर्ण चिदानन्दस्वरूपसे स्थित हो जाता है उसे बाह्य अथवा आन्तरिक किसी भी वस्तुका ज्ञान नहीं रहता ॥ ४७ ॥


पूर्वं समाधेरखिलं विचिन्तये-
दोङ्कारमात्रं सचराचरं जगत् ।
तदेव वाच्यं प्रणवो हि वाचको
विभाव्यतेऽज्ञानवशान्न बोधतः ॥ ४८ ॥

अर्थ: समाधि प्राप्त होनेके पूर्व ऐसा चिन्तन करे कि सम्पूर्ण चराचर जगत् केवल ओंकार-मात्र है। यह संसार वाच्य है और ओंकार इसका वाचक है। अज्ञानके कारण ही संसारकी प्रतीति होती है ज्ञान होनेपर इसका कुछ भी नहीं रहता ॥ ४८ ॥


अकारसंज्ञः पुरुषो हि विश्वको
ह्युकारस्तैजस ईर्यते क्रमात् ।
प्राज्ञो मकारः परिपठ्यतेऽखिलैः
समाधिपूर्वं न तु तत्त्वतो भवेत् ॥ ४९ ॥

अर्थ: (ओंकारमें अ उ और म ये तीन वर्ण हैं; इनमेंसे) अकार विश्व (जागृतिके अभिमानी) का वाचक है, उकार तैजस (स्वप्नका अभिमानी) कहलाता है और मकार प्राज्ञ (सुषुप्तिके अभिमानी) को कहते हैं; यह व्यवस्था समाधिलाभसे पहलेकी है, तत्त्वदृष्टिसे ऐसा कोई भेद नहीं है ॥ ४९ ॥


विश्वं त्वकारं पुरुषं विलापये-
दुकारमध्ये बहुधा व्यवस्थितम् ।
ततो मकारे प्रविलाप्य तैजसं
द्वितीयवर्णं प्रणवस्य चान्तिमे ॥ ५० ॥

अर्थ: नाना प्रकारसे स्थित अकाररूप विश्व पुरुषको उकारमें लीन करे और ओंकारके द्वितीय वर्ण तैजसरूप उकारको उसके अन्तिमवर्ण मकारमें लीन करे ॥ ५० ॥


मकारमप्यात्मनि चिद्घने परे
विलापयेत्प्राज्ञमपीह कारणम् ।
सोऽहं परं ब्रह्म सदा विमुक्तिम-
द्विज्ञानदृङ् मुक्त उपाधितोऽमलः ॥ ५१ ॥

अर्थ: फिर कारणात्मा प्राज्ञरूप मकारको भी चिद्घनरूप परमात्मामें लीन करे; (और ऐसी भावना करे कि) वह नित्यमुक्त विज्ञानस्वरूप उपाधिहीन निर्मल परब्रह्म मैं ही हूँ ॥ ५१ ॥


एवं सदा जातपरात्मभावनः
स्वानन्दतुष्टः परिविस्मृताखिलः ।
आस्ते स नित्यात्मसुखप्रकाशकः
साक्षाद्विमुक्तोऽचलवारिसिन्धुवत् ॥ ५२ ॥

अर्थ: इसप्रकार निरन्तर परात्मभावना करते-करते जो आत्मानन्दमें मग्न हो गया है तथा जिसे सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च विस्मृत हो गया है वह नित्य आत्मानन्दका अनुभव करनेवाला जीवन्मुक्त योगी निस्तरंग समुद्रके