अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ७ ] उत्तरकाण्ड ३६५
सप्तम सर्ग
भगवान् रामके यज्ञमें कुश और लवका गान, सीताजीका पृथिवी-प्रवेश,
रामचन्द्रजीका माताको उपदेश।
| श्रीमहादेव उवाच | **श्रीमहादेवजी बोले—**हे पार्वति ! वाल्मीकि मुनि- |
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| वाल्मीकिना बोधितोऽसौ कुशः सद्योगतभ्रमः।<br>अन्तर्मुक्तो बहिः सर्वमनुकुर्वंश्चचार सः ॥ १ ॥ | के इस प्रकार समझानेपर तुरन्त ही कुशका सारा भ्रम जाता रहा और वह अपने अन्तःकरणसे मुक्त होकर बाहरसे सम्पूर्ण क्रियाएँ करते हुए विचरने लगा ॥ १ ॥ |
| वाल्मीकिरपि तौ प्राह सीतापुत्रौ महाधियौ।<br>यत्र तत्र च गायन्तौ पुरे वीथिषु सर्वतः ॥ २ ॥ | तत्र वाल्मीकिजीने जहाँ-तहाँ नगरकी गलियोंमें सब ओर गाते हुए उन दोनों महाबुद्धिमान् सीता-पुत्रोंसे कहा—॥ २ ॥ |
| तस्याग्रे प्रगायेतां शुश्रूषुर्यदि राघवः।<br>न ग्राह्यं वै युवाभ्यां तद्यदि किञ्चित्प्रदास्यति ॥३॥ | “यदि महाराज रामकी सुननेकी इच्छा हो तो उनके सामने भी गाओ, परन्तु वे कुछ देने लगें तो लेना मत” ॥ ३ ॥ |
| इति तौ चोदितौ तत्र गायमानौ विचेरतुः।<br>यथोक्तं ऋषिणा पूर्वं तत्र तत्राभ्यगायताम् ॥ ४ ॥ | मुनिकी ऐसी आज्ञा होनेपर वे गाते हुए विचरने लगे। ऋषिने जहाँ-जहाँ गान करनेको पहले कहा था उन्हीं-उन्हीं स्थानोंपर उन्होंने गान किया। |
| तं स शुश्राव काकुत्स्थः पूर्वचर्यां ततस्ततः।<br>अपूर्वपाठजातिं च गेयेन समभिप्लुताम् ॥ ५ ॥ | तब ककुत्स्थनन्दन रघुनाथजीने जहाँ-तहाँ अपने पूर्व-चरित्रके गाये जानेका समाचार सुना। |
| बाल्यो राघवः श्रुत्वा कौतूहलमुपेयिवान्।<br>अथ कर्मान्तरे राजा समाहूय महामुनीन् ॥६॥ | भगवान् रामको यह सुनकर कि, उन बालकोंकी गान-विधि निराले ही ढंगकी और स्वर-ताल-सम्पन्न है, बड़ा ही कुतूहल हुआ। |
| राज्ञश्चैव नरव्याघ्रः पण्डितांश्चैव नैगमान्।<br>पौराणिकाञ् शब्दविदो ये च वृद्धा द्विजातयः ॥७॥ | अतः नरशार्दूल महाराज रामने यज्ञकर्मके विश्राम-समयमें सम्पूर्ण मुनीश्वरों, राजाओं, पण्डितों, शास्त्रज्ञों, पौराणिकों, शब्दशास्त्रियों, बड़े-बूढ़ों और द्विजातियोंको बुलाया ॥ ४-७ ॥ |
| एतान्सर्वान्समाहूय गायकौ समवेशयत्।<br>ते सर्वे हृष्टमनसो राजानो ब्राह्मणादयः ॥ ८ ॥ | इन सबको बुला चुकनेपर उन्होंने गानेवाले बालकोंको बुलाया। वे सब राजा और ब्राह्मण आदि प्रसन्न-चित्तसे महाराज राम और उन |
| रामं तौ दारको दृष्ट्वा विस्मिता ह्यनिमेषणाः।<br>अवोचन् सर्व एवेते परस्परमथागताः ॥ ९ ॥ | दोनों बालकोंको देखकर आश्चर्यचकित हो गये और उनकी टकटकी बँध गयी। तब वहाँ एकत्रित हुए वे सब लोग आपसमें कहने लगे—॥ ८-९॥ |
| इमौ रामस्य सदृशौ बिम्बाद्विम्बमिवोदितौ।<br>जटिलौ यदि न स्यातां न च वल्कलधारिणौ ॥१०॥ | “ये दोनों तो, बिम्बसे प्रकट हुए प्रतिबिम्बके समान, श्रीरामचन्द्रजीके समान ही दिखायी देते हैं। यदि ये जटाजूट और वल्कल धारण किये न होते तो इनमें और रघुनाथजीमें कोई |
| विशेषं नाधिगच्छामो राघवस्यानयोस्तदा।<br>एवं संवदतां तेषां विस्मितानां परस्परम् ॥११॥ | अन्तर ही न जान पड़ता।” इस प्रकार, जब वे सब लोग आश्चर्यचकित होकर आपसमें विवाद कर रहे थे |
| उपनद्धमभूत्तूर्णं तावुभौ मुनिदारकौ।<br>ततः प्रवृत्तं मधुरं गान्धर्वमतिमानुषम् ॥१२॥ | उन दोनों मुनिकुमारोंने गानेकी तैयारी की और (कुछ ही देरमें) वहाँ अत्यन्त मधुर एवं अलौकिक गान होने लगा ॥ १०--१२ ॥ |