भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished423 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 423 में से

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पृष्ठ 398

[ सर्ग ९७ ] | उत्तरकाण्ड | ३६७


मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वाल्मीकेः पृष्ठतः सीतां साधुवादो महानभूत् ।<br>तदा मध्ये जनौघस्य प्रविश्य मुनिपुङ्गवः ॥२७॥<br><br>सीतासहायो वाल्मीकिरिति प्राह च राघवम् ।<br>इयं दाशरथे सीता सुव्रता धर्मचारिणी ॥२८॥<br><br>अपापा ते पुरा त्यक्ता ममाश्रमसमीपतः ।<br>लोकापवादभीतेन त्वया राम महावने ॥२९॥<br><br>प्रत्ययं दास्यते सीता तदनुज्ञातुमर्हसि ।<br>इमौ तु सीतातनयाविमौ यमलजातको ॥३०॥<br><br>सुतौ तु तव दुर्धर्षो तथ्यमेतद्ब्रवीमि ते ।<br>प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो रघुकुलोद्वह ॥३१॥<br><br>अनृतं न स्मराम्युक्तं यथेमौ तव पुत्रकौ ।<br>बहून्वर्षगणान् सम्यक्तपश्चर्या मया कृता ॥३२॥<br><br>नोपाश्नीयां फलं तस्या दुष्टेयं यदि मैथिली ।<br>वाल्मीकिनैवमुक्तस्तु राघवः प्रत्यभाषत ॥३३॥<br><br>एवमेतन्महाप्राज्ञ यथा वदसि सुव्रत ।<br>प्रत्ययो जनितो मह्यं तव वाक्यैरकिल्विषैः ॥३४॥<br><br>लङ्कायामपि दत्तो मे वैदेह्या प्रत्ययो महान् ।<br>देवानां पुरतस्तेन मन्दिरे सम्प्रवेशिता ॥३५॥<br><br>सेयं लोकभयाद्ब्रह्मन्नपापाऽपि सती पुरा ।<br>सीता मया परित्यक्ता भवांस्तत्क्षन्तुमर्हति ॥३६॥<br><br>ममैव जातौ जानामि पुत्रावेतौ कुशीलवौ ।<br>शुद्धायां जगतीमध्ये सीतायां प्रीतिरस्तु मे ॥३७॥<br><br>देवाः सर्वे परिज्ञाय रामाभिप्रायमुत्सुकाः ।<br>ब्राह्मणमग्रतः कृत्वा समाजग्मुः सहस्रशः ॥३८॥<br><br>प्रजाः समागमन्हृष्टाः सीता कौशेयवासिनी ।<br>उदङ्मुखी ह्यधोदृष्टिः प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥३९॥देख उस जन-समाजमें बड़ा भारी साधुवाद (धन्य है, धन्य है—ऐसा शब्द) होने लगा । तब सीताजीके सहित मुनिश्रेष्ठ वाल्मीकिने उस जन-समूहमें घुसकर श्रीरघुनाथजीसे कहा—"हे दशरथनन्दन ! इस पतिव्रता धर्मपरायणा निष्कलङ्का सीताको तुमने कुछ समय हुआ लोकापवादसे डरकर भयंकर वनमें मेरे आश्रमके पास छोड़ दिया था ॥ २५--२९ ॥ अब वह अपना विश्वास देना चाहती है, आप उसे आज्ञा दीजिये । ये दोनों (कुश और लव) सीताके एक साथ उत्पन्न हुए पुत्र हैं ॥ ३० ॥ मैं सच कहता हूँ, ये दोनों दुर्जय-वीर आपकी ही सन्तान हैं। हे राघव ! मैं प्रजापति प्रचेता-का दशवाँ पुत्र हूँ ॥ ३१ ॥ मैंने कभी मिथ्या भाषण किया हो—ऐसा मुझे स्मरण नहीं है; वही मैं आपसे कहता हूँ कि ये बालक आपकीके पुत्र हैं। मैंने अनेकों वर्षतक खूब तपस्या की है ॥३२॥ यदि इस मिथिलेश-कुमारीमें कोई दोष हो तो मुझे उस तपस्याका कोई फल न मिले ।"<br><br>वाल्मीकिजीके इस प्रकार कहनेपर श्रीरघुनाथजी बोले—॥ ३३ ॥ "हे महाप्राज्ञ ! हे सुव्रत ! आप जैसा कहते हैं, बात ऐसी ही है । आपके निर्दोष वाक्योंसे ही मुझे तो पूर्ण विश्वास हो गया ॥ ३४ ॥ जानकी-जीने लंकामें भी देवताओंके सामने बड़ी विकट परीक्षा दी थी, इसीलिये मैंने उन्हें अपने घरमें रख लिया था ॥ ३५ ॥ किन्तु हे ब्रह्मन् ! उन्हीं सती सीताजीको, सर्वथा निर्दोष होते हुए भी, मैंने लोकनिन्दाके भयसे कुछ दिन हुए छोड़ दिया, सो आप मेरा यह अपराध क्षमा करें ॥ ३६ ॥ मैं यह भी जानता हूँ कि ये दोनों पुत्र कुश और लव मुझसेही उत्पन्न हुए हैं; संसारमें परम साध्वी सीतामें मेरी प्रीति हो" ॥ ३७ ॥<br><br>उस समय, रामजीका अभिप्राय जानकर समस्त देवगण अति उत्सुक हो ब्रह्माजीको आगे कर सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ आये ॥ ३८ ॥ तथा बहुत-से प्रजाजन भी प्रसन्नचित्तसे वहाँ एकत्रित हो गये । तब रेशमी वस्त्र धारण किये उत्तरकी ओर मुख और नीचेको नेत्र किये खड़ी हुई श्रीसीताजीने हाथ जोड़कर कहा—
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