अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| ३७८ | अध्यात्मरामायण | [सर्ग ९] |
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नवम सर्ग
महाप्रयाण।
| श्रीमहादेव उवाच | श्रीमहादेवजी बोले— |
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| लक्ष्मणं तु परित्यज्य रामो दुःखसमन्वितः ।<br>मन्त्रिणो नैगमांश्चैव वसिष्ठं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥ | हे पार्वति ! लक्ष्मणजीको त्याग देनेपर रघुनाथजीने अत्यन्त दुःखातुर हो मन्त्रियों, वेदवेत्ताओं और वसिष्ठजीसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥ |
| अभिषेक्ष्यामि भरतमधिराज्ये महामतिम् ।<br>अद्य चाहं गमिष्यामि लक्ष्मणस्य पदानुगः ॥ २ ॥ | “आज महामति भरतको राजतिलक कर मैं भी लक्ष्मणके मार्गका अनुसरण करूँगा” ॥ २ ॥ |
| एवमुक्ते रघुश्रेष्ठे पौरजानपदास्तदा ।<br>द्रुमा इवच्छिन्नमूला दुःखार्ताः पतिता भुवि ॥ ३ ॥ | रघुनाथजीके इस प्रकार कहनेपर पुरवासी तथा देशवासी लोग दुःखातुर होकर जड़से कटे हुए वृक्षके समान पृथिवीपर गिर पड़े ॥ ३ ॥ |
| मूर्च्छितो भरतो चापि श्रुत्वा रामाभिभाषितम् ।<br>गर्हयामास राज्यं स प्राहेदं रामसन्निधौ ॥ ४ ॥ | रामजीका कथन सुनकर भरतजीको भी मूर्च्छा आ गयी। उन्होंने रघुनाथजीके निकट राज्यकी निन्दा करते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥ |
| सत्येन च शपे नाहं त्वां विना दिवि वा भुवि ।<br>काङ्क्षे राज्यं रघुश्रेष्ठ शपे त्वत्पादयोः प्रभो ॥ ५ ॥ | “हे रघुश्रेष्ठ ! मैं सत्यकी शपथ करके कहता हूँ, हे प्रभो ! मुझे आपके चरणोंकी सौगन्ध है कि आपके बिना मुझे स्वर्ग-लोक या भूर्लोक कहींके भी राज्यकी इच्छा नहीं है ॥ ५ ॥ |
| इमौ कुशलवौ राजन्नभिषिञ्चस्व राघव ।<br>कोशलेषु कुशं वीरमुत्तरेषु लवं तथा ॥ ६ ॥ | हे महाराज राम ! इन कुश और लवको ही राजतिलक कीजिये—अवधमें वीरवर कुशको और उत्तरमें लवको राजा बनाइये ॥ ६ ॥ |
| गच्छन्तु दूतास्त्वरितं शत्रुघ्नानयनाय हि ।<br>अस्माकमेतद्गमनं खर्वासय शृणोतु सः ॥ ७ ॥ | शीघ्र ही शत्रुघ्नको लानेके लिये दूत जाने चाहिये, जिससे वह भी हमारे स्वर्ग-वासके लिये जानेका वृत्तान्त सुन ले” ॥ ७ ॥ |
| भरतेनोदितं श्रुत्वा पतितास्ताः समीक्ष्य तम् ।<br>प्रजाश्च भयसंविग्ना रामविश्लेषकातराः ॥ ८ ॥<br>वसिष्ठो भगवान् राममुवाच सदयं वचः ।<br>पश्य तातादरात्सर्वाः पतिता भूतले प्रजाः ॥ ९ ॥ | भरतजीका कथन सुन उनकी ओर देखकर सम्पूर्ण प्रजा भयभीत तथा रामजीके वियोगसे व्याकुल हो पृथिवीपर गिर पड़ी। तब भगवान् वसिष्ठजीने रघुनाथजीसे करुणायुक्त वचन कहा— “हे तात ! सारी प्रजा पृथिवीपर पड़ी हुई है उसे कृपा-दृष्टिसे देखो ॥ ८-९ ॥ |
| तासां भावानुगं राम प्रसादं कर्तुमर्हसि ।<br>श्रुत्वा वसिष्ठवचनं ताः समुत्थाप्य पूज्य च ॥ १० ॥<br>सस्नेहो रघुनाथस्ताः किं करोमीति चाब्रवीत् ।<br>ततः प्राञ्जलयः प्रोचुः प्रजा भक्त्या रघूद्वहम् ॥ ११ ॥ | हे राम ! इनके प्रेम-भावानुसार तुम्हें भी इनपर कृपा करनी चाहिये।” वसिष्ठजीके ये वचन सुनकर रघुनाथजीने उन सबोंको उठाया और उनका सत्कार कर उनसे प्रेमपूर्वक पूछा— “कहो, मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ ?” तब प्रजाजन हाथ जोड़कर रघुनाथजीसे भक्तिपूर्वक बोले ॥ १०-११ ॥ |
| गन्तुमिच्छसि यत्र त्वमनुगच्छामहे वयम् ।<br>अस्माकमेषा परमा प्रीतिर्धर्मोऽयमक्षयः ॥ १२ ॥ | “आप जहाँ जाना चाहते हैं हम भी वहीं आपका अनुगमन करेंगे। यही हमारी सबसे बड़ी प्रसन्नता और अक्षय धर्म है ॥ १२ ॥ |
| तवानुगमने राम हृद्गता नो दृढा मतिः ।<br>पुत्रदारादिभिः सार्धमनुयामोऽद्य सर्वथा ॥ १३ ॥<br>तपोवनं वा स्वर्गं वा पुरं वा रघुनन्दन । | हे राम ! हमारे हृदयमें आपका अनुगमन करनेका ही दृढ़ विचार है। अतः हे रघुनन्दन ! आप तपोवन, नगर, स्वर्ग आदि कहीं |