अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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सर्ग ९] उत्तरकाण्ड ३८१
| शास्त्राणि शस्त्राणि धनुश्च बाणां<br>जग्मुः पुरस्ताद्धृतविग्रहास्ते ॥४०॥<br>वेदाश्च सर्वे धृतविग्रहाश्च<br>ययुश्च सर्वे मुनयश्च दिव्याः ।<br>माता श्रुतीनां प्रणवेन साध्वी<br>ययौ हरिं व्याहृतिभिः समेता ॥४१॥ | चली । भगवान्के आगे सम्पूर्ण शास्त्र, शस्त्र और उनके धनुष-बाण मूर्तिमान् होकर चले ॥ ४० ॥ इसी प्रकार समस्त वेद, समस्त दिव्य मुनिजन तथा ॐकार और व्याहृतियोंके सहित वेदमाता गायत्री—ये सब भी शरीर धारण कर श्रीहरिके साथ चले ॥ ४१ ॥ |
| गच्छन्तमेवानुगता जनास्ते<br>सपुत्रदाराः सह बन्धुवर्गैः ।<br>अनावृतद्वारमिवापवर्गं<br>रामं व्रजन्तं ययुराप्तकामाः ।<br>सान्तःपुरः सानुचरः सभार्यः<br>शत्रुघ्नयुक्तो भरतोऽनुयातः ॥४२॥ | इस प्रकार रघुनाथजीके चलनेपर अपने बन्धु-बान्धव और स्त्री-पुत्रादिके सहित समस्त पुरजन इस प्रकार चले मानो सफलमनोरथ हो स्वर्गके खुले द्वारको जाते हों । फिर रनवास, सेवकगण, स्त्री और शत्रुघ्नके सहित भरतजी भी चले ॥ ४२ ॥ |
| गच्छन्तमालोक्य रमासमेतं<br>श्रीराघवं पौरजनाः समस्ताः ।<br>सवालवृद्धाश्च ययुर्द्विजाग्र्याः<br>सामात्यवर्गाश्च समन्त्रिणो ययुः ॥४३॥ | रघुनाथजीको लक्ष्मीजीके सहित जाते देख बालक और वृद्धोंके सहित समस्त पुरजन तथा अमात्य और मन्त्रियोंके सहित समस्त ब्राह्मणगण चले ॥ ४३ ॥ |
| सर्वे गताः क्षत्रमुखाः प्रहृष्टा<br>वैश्याश्च शूद्राश्च तथा परे च ।<br>सुग्रीवमुख्या हरिपुङ्गवाश्च<br>स्नाता विशुद्धाः शुभशब्दयुक्ताः ॥४४॥ | उनके पश्चात् मुख्य-मुख्य क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्य अन्त्यजादि सभी लोग अति हर्षपूर्वक चले । फिर सुग्रीवादि श्रेष्ठ वानरगण स्नानादिसे शुद्ध हो ('श्रीरामचन्द्रजीकी' जय आदि) मंगलमय शब्द करते हुए चले ॥४४॥ |
| न कश्चिदासीद्भवदुःखयुक्तो<br>दीनोऽथवा बाह्यसुखेषु सक्तः ।<br>आनन्दरूपानुगता विरक्ता<br>ययुश्च रामं पशुभृत्यवर्गैः ॥४५॥ | (उनमेंसे) कोई भी संसार-दुःखसे दुःखी, दीन अथवा बाह्य विषयोंमें आसक्त नहीं था । वे सभी परमानन्दरूप भगवान् रामके अनुगामी संसारसे उपराम होकर अपने पशु और नौकर-चाकरोंके सहित रघुनाथजीके साथ चले गये ॥ ४५ ॥ |
| भूतान्यदृश्यानि च यानि तत्र<br>ये प्राणिनः स्थावरजङ्गमाश्च ।<br>साक्षात्परात्मानमनन्तशक्तिं<br>जग्मुर्विरक्ताः परमेकमीशम् ॥४६॥ | जो प्राणी कभी दिखलायी नहीं पड़ते थे तथा जितने स्थावर और जंगम जीव थे वे सभी संसारसे विरक्त होकर एकमात्र परमेश्वर अनन्तशक्ति साक्षात् परमात्मा रामके साथ चले ॥ ४६ ॥ |
| नासीदयोध्यानगरे तु जन्तुः<br>कश्चित्तदा राममना न यातः ।<br>शून्यं बभूवाखिलमेव तत्र<br>पुरं गते राजनि रामचन्द्रे ॥४७॥ | उस समय अयोध्यामें ऐसा कोई जीव नहीं था जो भगवान् राममें चित्त लगाकर उनका अनुगामी न हुआ हो । महाराज रामचन्द्रके कूच करते ही वह सारा नगर सूना हो गया ॥ ४७ ॥ |
| ततोऽतिदूरं नगरात्स गत्वा<br>दृष्ट्वा नदीं तां हरिनेत्रजाताम् ।<br>ननन्द रामः स्मृतपावनोऽतो<br>ददर्श चाशेषमिदं हृदिस्थम् ॥४८॥ | नगरसे बहुत दूर निकल जानेपर श्रीरघुनाथजीने विष्णुभगवान्के नेत्रसे प्रकट हुई (सरयू) नदी देखी । उसे देखकर भगवान् बड़े प्रसन्न हुए और उन्हें अपने विशुद्ध स्वरूपकी स्मृति हो आयी; अतः वे इस सम्पूर्ण जगत्को अपने हृदयमें स्थित देखने लगे ॥ ४८ ॥ |