भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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३८४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ९

ततो विमग्नाः सरयूजलेषु
नराः परित्यज्य मनुष्यदेहम् ।
आरुह्य दिव्याभरणा विमानं
प्रापुश्च ते सान्तनिकाख्यलोकान् ॥६६॥
अयोध्या-निवासी लोग सरयूके जलमें डूब-डूबकर मनुष्य देहको त्याग दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हो विमानोंपर चढ़कर सान्तनिक नामक लोकोंमें पहुँच गये ॥६६॥

तिर्यक्प्रजाता अपि रामदृष्टा
जलं प्रविष्टा दिवमेव याताः ।
दिदृक्षवो जानपदाश्च लोका
रामं समालोक्य विमुक्तसङ्गाः ।
स्मृत्वा हरिं लोकगुरुं परेशं
स्पृष्ट्वा जलं स्वर्गमवापुरञ्जः ॥६७॥
जो तिर्यक् योनियोंमें उत्पन्न हुए थे वे (कूकुर-शूकर आदि) भी भगवान् रामकी दृष्टि पड़नेसे जलमें डूबकर स्वर्गलोकको ही चले गये। जो देशवासी लोग यह सब कौतुक देखनेके लिये आये थे वे भी श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन कर संसारकी आसक्तिको छोड़ लोकगुरु परमेश्वर भगवान् विष्णुका स्मरण करते हुए जलस्पर्श कर अनायास स्वर्गको चले गये ॥ ६७ ॥

एतावदेवोत्तरमाह शम्भुः
श्रीरामचन्द्रस्य कथावशेषम् ।
यः पादमप्यत्र पठेत्स पापा-
द्विमुच्यते जन्मसहस्रजातात् ॥६८॥
श्रीमहादेवजीने भगवान् रामकी कथाका परिशिष्ट रूप यह इतना ही उत्तरकाण्ड कहा है। जो पुरुष इसका एक पाद (चौथाई श्लोक) भी पढ़ता है वह अपने हजारों जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ६८॥

दिने दिने पापचयं प्रकुर्वन्
पठेन्नरः श्लोकमपीह भक्त्या ।
विमुक्तसर्वाघचयः प्रयाति
रामस्य सालोक्यमनन्यलभ्यम् ॥६९॥
नित्यप्रति अनेकों पाप करनेवाला पुरुष यदि भक्तिपूर्वक इसका एक श्लोक भी पढ़े तो सम्पूर्ण पापराशिसे छूटकर श्रीरामके सालोक्य-पदको प्राप्त हो जाता है, जो दूसरोंके लिये अलभ्य है॥ ६९॥

आख्यानमेतद्रघुनायकस्य
कृतं पुरा राघवचोदितेन ।
महेश्वरेणाप्तभविष्यदर्थं
श्रुत्वा तु रामः परितोषमेति ॥७०॥
श्रीरघुनाथजीकी प्रेरणासे उनकी इस कथाको, जिसमें भविष्य चरित्रोंका ही वर्णन किया गया है, पहले श्रीमहादेवजीने रचा था। इसको सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न होते हैं ॥ ७०॥

रामायणं काव्यमनन्तपुण्यं
श्रीशङ्करेणाभिहितं भवान्यै ।
भक्त्या पठेद्यः शृणुयात्स पापै-
र्विमुच्यते जन्मशतोद्भवैश्च ॥७१॥
रामायण नामक यह अनन्त पुण्यप्रद काव्य श्रीशंकरभगवान्ने पार्वतीजीसे कहा है। जो पुरुष इसे भक्तिपूर्वक पढ़ता अथवा सुनता है वह अपने सैकड़ों जन्मोंके पापपुञ्जसे मुक्त हो जाता है ॥ ७१ ॥

अध्यात्मरामं पठतश्च नित्यं
श्रोतुश्च भक्त्या लिखितुश्च रामः ।
अतिप्रसन्नश्च सदा समीपे
सीतासमेतः श्रियमातनोति ॥७२॥
इस अध्यात्मरामायणको नित्यप्रति पढ़ने, सुनने अथवा भक्तिपूर्वक लिखनेवालेसे अत्यन्त प्रसन्न होकर भगवान् राम सीताजीके सहित उसके पास रहकर उसकी श्रीवृद्धि करते हैं॥ ७२ ॥

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