भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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संकोच और आश्चर्य तभीतक है जबतक हम सच्चे कर्ताको भूलकर तुच्छ देहाभिमानके शिरपर सारे कर्तृत्व-भोक्तृत्वका भार लाद देते हैं और उस देहाभिमानको देहाभिमान न समझकर अपना परमार्थस्वरूप मान बैठते हैं, नहीं तो जो लीलामय बिना किसी प्रयोजनके केवल लीलाके लिये ही इच्छामात्रसे इस अनन्त ब्रह्माण्डकी सृष्टि करते हैं, जिनकी मायासे मोहित होकर हमारी इस हाड़-मांसके पञ्जरमें आत्मबुद्धि होती है और फिर इसीकी आसक्तिमें फँसकर स्त्री-धन-धरती आदि महाघृणित और असार वस्तुओंमें रमणीय-बुद्धि होती है तथा जिनके लेशमात्र कृपाकणसे यह अनन्त ब्रह्माण्ड बालूकी भाँत हो जाता है, उन महामहिम सर्वशक्तिमान् सर्वेश्वरके लिये क्या दुष्कर है ? उनकी जैसी इच्छा होती है उसी ओर सबको प्रवृत्त होना पड़ता है और उनकी इच्छाके अनुसार ही उन्हें उसमें सफलता अथवा असफलता प्राप्त होती रहती है।

अस्तु। ‘तोमार इच्छा पूर्ण हउक करुणामय स्वामी’ इस वंग-कहावतके अनुसार प्रभुने जो कार्य सौंपा है उसे उन्हींका काम समझकर उन्हींके इङ्गितके अनुसार करते रहनेमें ही हमारा कल्याण है; और वास्तवमें हम करते भी ऐसा ही हैं, परन्तु ऐसा समझते नहीं। इसीलिये उसकी सफलता-असफलतामें हर्ष-शोकके शिकार होते हैं। प्रभु हमें ऐसा ही समझते रहनेकी शक्ति प्रदान करें।

श्रीमदध्यात्मरामायण कोई नवीन ग्रन्थ नहीं है, जिसके विषयमें कुछ विशेष कहनेकी आवश्यकता हो। यह परम पवित्र गाथा साक्षात् भगवान् शंकरने अपनी प्रेयसी आदिशक्ति श्रीपार्वतीजीको सुनायी है। यह आख्यान ब्रह्माण्डपुराणके उत्तरखण्डके अन्तर्गत माना जाता है। अतः इसके रचयिता महामुनि वेदव्यासजी ही हैं। इसमें परमरसायन रामचरितका वर्णन करते-करते पद-पदपर प्रसंग उठाकर भक्ति, ज्ञान, उपासना, नीति और सदाचार-सम्बन्धी दिव्य उपदेश दिये गये हैं। विविध विषयोंका विवरण रहनेपर भी इसमें प्रधानता अध्यात्मतत्त्वके विवेचनकी ही है। इसीलिये यह 'अध्यात्म-रामायण' कहलाता है। उपदेशभागके सिवा इसका कथाभाग भी कुछ कम महत्त्वका नहीं है। भगवान् श्रीराम मूर्त्तिमान् अध्यात्मतत्त्व हैं, उनके परमपावन चरित्रकी महिमाका कहाँतक वर्णन किया जाय ? आजकल जिस श्रीरामचरितमानसमें अवगाहन कर करोड़ों नर-नारी अपनेको कृतकृत्य मान रहे हैं उसके कथानकका आधार भी अधिकांशमें यही ग्रन्थ है। श्रीरामचरितमानसकी कथा जितनी अध्यात्मरामायणसे मिलती-जुलती है उतनी और किसीसे नहीं मिलती। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि श्रीगोस्वामी तुलसीदासजीने भी इसीका प्रामाण्य सबसे अधिक स्वीकार किया है।

अबतक इस ग्रन्थके कई अनुवाद हो चुके हैं। चार-पाँच तो मेरे देखनेमें भी आये हैं। प्रस्तुत अनुवादमें श्रीवेंकटेश्वर स्टीमप्रेसद्वारा प्रकाशित स्वर्गीय पं० बलदेवप्रसादजी मिश्र तथा स्वर्गीय पं० रामेश्वरजी भट्टके अनुवादोंसे सहायता ली गयी है। इसके लिये उक्त दोनों महानुभावोंका मैं हृदयसे कृतज्ञ हूँ। इस ग्रन्थरत्नका अनुवाद करनेका आदेश देकर गीताप्रेसने मुझे इसके अनुशीलनका अमूल्य अवसर दिया है और फिर उसीने इसका संशोधन कराकर इसे प्रकाशित करनेकी भी कृपा की है, इस उपकारके लिये मैं उसके सञ्चालकोंका हृदयसे आभारी हूँ।

अन्तमें, जिन लीलामयके लीलाकटाक्षसे प्रेरित होकर यह लीला हुई है, उनकी यह लीला आदरपूर्वक उन्हींको समर्पित है। इसमें यदि कुछ अच्छा है तो उन्हींके कृपाकटाक्षका प्रसाद है और जो भूल है वह मेरी अहंकारजनित धृष्टताका फल है। इत्यलम्।

\begin{aligned} & विनीत- \ & अनुवादक \end{aligned}

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