भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ३ ]अयोध्याकाण्ड५३
यदि किञ्चिद्विलम्बेत प्राणांस्त्यक्ष्ये तवाग्रतः।<br>भव सत्यप्रतिज्ञस्त्वमेतदेव मम प्रियम् ॥२२॥आप अपनी प्रतिज्ञा सत्य कीजिये, मेरा प्रिय कार्य बस यही है” ॥२२॥
श्रुत्वैतद्दारुणं वाक्यं कैकेय्या रोमहर्षणम्।<br>निपपात महीपालो वज्राहत इवाचलः ॥२३॥कैकेयीके ऐसे रोमाञ्चकारी कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ वज्राहत पर्वतके समान गिर पड़े ॥२३॥
शनैरून्मील्य नयने विमृज्य परया भिया।<br>दुःस्वप्नो वा मया दृष्टो ह्यथवा चित्तविभ्रमः ॥२४॥तत्पश्चात् धीरे-धीरे नेत्र खोलकर अति भयपूर्वक आँसू पोंछे और मन-ही-मन कहने लगे— 'मैंने यह कोई दुःस्वप्न देखा है या मेरे चित्तको भ्रम हो गया है?' ॥२४॥
इत्यालोक्य पुरः पत्नीं व्याघ्रीमिव पुरः स्थिताम्।<br>किमिदं भाषसे भद्रे मम प्राणहरं वचः ॥२५॥इसी समय अपने सामने सिंहिनीके समान बैठी हुई रानी कैकेयीको देखकर कहने लगे—"हे भद्रे ! मेरे प्राणोंको हरनेवाले तुम ये क्या वचन बोल रही हो ? ॥२५॥
रामः कमपराधं ते कृतवान्कमलेक्षणः।<br>ममाग्रे राघवगुणान्वर्णयस्यनिशं शुभान् ॥२६॥कमलनयन रामने तुम्हारा क्या अपराध किया है ? तुम तो अहर्निश मेरे सामने रामके शुभ गुण गाया करती थी ॥ २६ ॥
कौसल्यां मां समं पश्यन् शुश्रूषां कुरुते सदा।<br>इति ब्रुवन्ती त्वं पूर्वमिदानीं भाषसेऽन्यथा ॥२७॥तुम तो पहले कहा करती थी कि 'राम मुझे और कौसल्याको समान जानकर सदा ही मेरी सेवा किया करते हैं।' फिर इस समय तुम यह उलटी बात कैसे कह रही हो ? ॥२७॥
राज्यं गृहाण पुत्राय रामस्तिष्ठतु मन्दिरे ।<br>अनुगृहीष्व मां वामे रामान्नास्ति भयं तव ॥२८॥तुम अपने पुत्रके लिये राज्य ले लो, किन्तु रामको घर ही रहने दो। हे वामे ! तुम मुझपर कृपा करो, रामसे तुम्हें कोई भय न करना चाहिये" ॥ २८ ॥
इत्युक्त्वाऽश्रुपरीताक्षः पादयोर्निपपात ह।<br>कैकेयी प्रत्युवाचेदं साऽपि रक्तान्तलोचना॥२९॥ऐसा कहकर महाराज दशरथ नेत्रोंमें जल भरकर कैकेयीके चरणोंमें गिर पड़े । तब उस कैकेयीने आँखें लाल करके यों कहा—॥ २९॥
राजेन्द्र किं त्वं भ्रान्तोऽसि उक्तं तद्भाषसेऽन्यथा।<br>मिथ्या करोषि चेत्स्वीयं भाषितं नरको भवेत् ॥३०॥“राजेन्द्र ! क्या तुम्हारी बुद्धिमें भ्रम हो गया है जो अपने कथनके विपरीत बोल रहे हो; याद रखो, यदि तुमने अपनी प्रतिज्ञा भंग कर दी तो तुम्हें नरक भोगना पड़ेगा ॥ ३० ॥
वनं न गच्छेदयदि रामचन्द्रः<br>प्रभातकालेऽजिनचीरयुक्तः।<br>उद्बन्धनं वा विषभक्षणं वा<br>कृत्वा मरिष्ये पुरतस्तवाहम् ॥३१॥सुनो, यदि कल प्रातःकाल ही मृगचर्म और वल्कल-वस्त्र धारण कर राम वनको न गये तो मैं तुम्हारे सामने ही फाँसी लगाकर या विष खाकर मर जाऊँगी ॥ ३१ ॥
सत्यप्रतिज्ञोऽहमितीह लोके<br>विडम्ब्यसे सर्वसभान्तरेषु।<br>रामोपरि त्वं शपथं च कृत्वा<br>मिथ्याप्रतिज्ञो नरकं प्रयाहि ॥३२॥तुम संसारमें सभी सभाओंमें 'मैं सत्यप्रतिज्ञ हूँ' ऐसा कहकर लोगोंको धोखेमें डाला करते हो, अब तुम रामकी शपथ करके की हुई प्रतिज्ञाको भी तोड़ रहे हो, अतः तुम्हें नरकमें जाना पड़ेगा” ॥ ३२ ॥
इत्युक्तः प्रियया दीनो मग्नो दुःखार्णवे नृपः।<br>मूर्च्छितः पतितो भूमौ विसंज्ञो मृतको यथा ॥३३॥अपनी प्रियाके ऐसे कठोर वचन सुनकर महाराज दशरथ दुःख-समुद्रमें डूबकर बड़े व्याकुल हो गये,