अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ अध्यात्मरामायण [सर्ग ६
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नैषादराज्यमेतत्ते किङ्करस्य रघूत्तम ॥ ६५ ॥
त्वदधीनं वसन्नत्र पालयास्मान् रघूद्वह ।
आगच्छ यामो नगरं पावनं कुरु मे गृहम् ॥ ६६ ॥
गृहाण फलमूलानि त्वदर्थं सञ्चितानि मे ।
अनुगृहीष्व भगवन् दासस्तेऽहं सुरोत्तम ॥ ६७ ॥
हुआ है । हे रघुवर ! आपके दासका यह नैषाद-राज्य आपहीका है इसलिये हे रघुनाथजी ! आप यहाँ रहकर हमलोगोंकी रक्षा कीजिये । चलिये नगरमें पधारकर मेरा घर पवित्र कीजिये ॥ ६५-६६ ॥ हे भगवन् ! आपके लिये मैंने जो कुछ फल-मूलादि एकत्रित किये हैं उन्हें स्वीकार कीजिये । हे सुरश्रेष्ठ ! मैं आपका दास हूँ, आप मुझपर कृपा कीजिये" ॥ ६७ ॥
रामस्तमाह सुप्रीतो वचनं शृणु मे सखे ।
न वेक्ष्यामि गृहं ग्रामं नव वर्षाणि पञ्च च ॥ ६८ ॥
दत्तमन्येन नो भुञ्जे फलमूलादि किञ्चन ।
राज्यं ममैतत्त्वे सर्वं त्वं सखा मेऽतिवल्लभः ॥ ६९ ॥
तब रामचन्द्रजीने अति प्रसन्न होकर उससे कहा—"मित्र ! सुनो, मैं चौदह वर्षतक किसी घर या गाँवमें नहीं जा सकता ॥ ६८ ॥ और न किसी औरके दिये हुए फल-मूलादि ही खा सकता हूँ । मित्र ! तुम्हारा यह सम्पूर्ण राज्य मेरा ही है और तुम भी मेरे अत्यन्त प्रिय सखा हो" ॥ ६९ ॥
वटक्षीरं समानाय्य जटामुकुटमादरात् ।
बबन्ध लक्ष्मणेनाथ सहितो रघुनन्दनः ॥ ७० ॥
जलमात्रं तु सम्प्राश्य सीतया सह राघवः ।
आस्तृतं कुशपर्णाद्यैः शयनं लक्ष्मणेन हि ॥ ७१ ॥
उवास तत्र नगरप्रासादाग्रे यथा पुरा ।
सुष्वाप तत्र वैदेह्या पर्यङ्क इव संस्कृते ॥ ७२ ॥
ततोऽविदूरे परिगृह्य चापं
सवाणतूणीरधनुः स लक्ष्मणः ।
ररक्ष रामं परितो विपश्यन्
गुहेन सार्धं सशरासनेन ॥ ७३ ॥
तदनन्तर रघुनाथजीने वटका दूध मँगाकर लक्ष्मणके सहित भली प्रकार सँवारकर जटाजूट बाँधे ॥ ७० ॥ लक्ष्मणजीने कुश और पत्तोंकी एक शय्या बना दी, उसीपर केवल जल पीकर सीताके सहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हुए और पहले जिस प्रकार अयोध्यापुरीके महलमें जनकनन्दिनीके सहित सुसज्जित पलंगपर पौढ़ते थे उसी प्रकार सो गये ॥ ७१-७२ ॥ उनके पास ही धनुष, बाण और तरकश लिये हुए श्रीलक्ष्मणजी धनुषधारी गुहके सहित धनुष चढ़ाकर इधर-उधर देखते हुए श्रीरामचन्द्रजीकी रखवाली करने लगे ॥ ७३ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे अयोध्याकाण्डे
पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठ सर्ग
गंगोत्तरण तथा भरद्वाज और वाल्मीकिजीसे भेंट ।
श्रीमहादेव उवाच
सुप्तं रामं समालोक्य गुहः सोऽश्रुपरिप्लुतः ।
लक्ष्मणं प्राह विनयाद् भ्रातः पश्यसि राघवम् ॥ १ ॥
शयानं कुशपत्रौघसंस्तरे सीतया सह ।
यः शेते स्वर्णपर्यङ्के स्वास्तीर्णे भवनोत्तमे ॥ २ ॥
श्रीमहादेवजी बोले—हे पार्वति ! उस समय रामजीको सोते देख गुहने आँखोंमें आँसू भरकर नम्रतापूर्वक लक्ष्मणजीसे कहा—"भाई ! देखते हो, जो रघुनाथजी अपने भव्य-भवनमें सुन्दर बिछौनेसे युक्त सुवर्ण-निर्मित पलंगपर पौढ़ते थे वे ही आज सीताजीके सहित कुश और पत्तोंकी साथरीपर पड़े