भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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९६ * अग्निपुराण *


और शङ्ख धारण करनेवाले अच्युत आपलोगोंकी रक्षा करें। शङ्ख, गदा, चक्र और पद्म धारण करनेवाले बालवटुरूपधारी वामन, पद्म, चक्र, शङ्ख और गदा धारण करनेवाले जनार्दन, शङ्ख, पद्म, चक्र और गदाधारी यज्ञस्वरूप श्रीहरि तथा शङ्ख, गदा, पद्म एवं चक्र धारण करनेवाले श्रीकृष्ण मुझे भोग और मोक्ष देनेवाले हों॥ ८—१२॥

आदिमूर्ति भगवान् वासुदेव हैं। उनसे संकर्षण प्रकट हुए। संकर्षणसे प्रद्युम्न और प्रद्युम्नसे अनिरुद्धका प्रादुर्भाव हुआ। इनमेंसे एक-एक क्रमशः केशव आदि मूर्तियोंके भेदसे तीन-तीन रूपोंमें अभिव्यक्त हुआ। (अतः कुल मिलाकर बारह स्वरूप हुए)$^१$। चौबीस-मूर्तियोंकी स्तुतिसे युक्त इस द्वादशाक्षर स्तोत्रका जो पाठ अथवा श्रवण करता है, वह निर्मल होकर सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है$^२$॥ १३—१५॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'श्रीहरिकी चौबीस मूर्तियोंके स्तोत्रका वर्णन' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ४८॥


उनचासवाँ अध्याय

मत्स्यादि दशावतारोंकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका वर्णन

भगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं तुम्हें मत्स्य आदि दस अवतार-विग्रहोंका लक्षण बताता हूँ। मत्स्यभगवान्‌की आकृति मत्स्यके समान और कूर्म भगवान्‌की प्रतिमा कूर्म (कच्छप)के आकारकी होनी चाहिये। पृथ्वीके उद्धारक भगवान् वराहको मनुष्याकार बनाना चाहिये, वे दाहिने हाथमें गदा और चक्र धारण करते हैं। उनके बायें हाथमें शङ्ख और पद्म शोभा पाते हैं।


$^१.$ तात्पर्य यह है कि वासुदेवसे केशव, नारायण और माधवकी, संकर्षणसे गोविन्द, विष्णु और मधुसूदनकी, प्रद्युम्नसे त्रिविक्रम, वामन और श्रीधरकी तथा अनिरुद्धसे हृषीकेश, पद्मनाभ एवं दामोदरकी अभिव्यक्ति हुई।
$^२.$ इस अध्यायमें बारह श्लोक स्तुतिके हैं। प्रत्येक श्लोकमें भगवान्‌की दो-दो मूर्तियोंका स्तवन हुआ तथा इन बारहौं श्लोकोंके आदिका एक-एक अक्षर जोड़नेसे 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' यह द्वादशाक्षर मन्त्र बनता है। इसीलिये इसे द्वादशाक्षर-स्तोत्र एवं चौबीस मूर्तियोंका स्तोत्र कहते हैं।


श्रीभगवानुवाच—
रूपः केशवः पद्मशङ्खचक्रगदाधरः। नारायणः शङ्खपद्मगदाचक्री प्रदक्षिणम्॥ १॥
तो गदी माधवोऽरिशङ्खपद्मी नमामि तम्। चक्रकौमोदकीपद्मशङ्खी गोविन्द ऊर्जितः॥ २॥
मोक्षदः श्रीगदी पद्मी शङ्खी विष्णुश्च चक्रधृक्। शङ्खचक्राब्जगदिनं मधुसूदनमानमे॥ ३॥
क्त्या त्रिविक्रमः पद्मगदी चक्री च शङ्ख्यपि। शङ्खचक्रगदापद्मी वामनः पातु मां सदा॥ ४॥
तिदः श्रीधरः पद्मी चक्रशार्ङ्गी च शङ्ख्यपि। हृषीकेशो गदी चक्री पद्मी शङ्खी च पातु नः॥ ५॥
रदः पद्मनाभस्तु शङ्खाब्जारिगदाधरः। दामोदरः पद्मशङ्खगदाचक्री नमामि तम्॥ ६॥
तेने गदी शङ्खचक्री वासुदेवोऽब्जभृज्जगत्। संकर्षणो गदी शङ्खी पद्मी चक्री च पातु वः॥ ७॥
वादी चक्री शङ्खगदी प्रद्युम्नः पद्मभृत्प्रभुः। अनिरुद्धश्चक्रगदी शङ्खी पद्मी च पातु नः॥ ८॥
सुरेशोऽर्यब्जशङ्खाढ्यः श्रीगदी पुरुषोत्तमः। अधोक्षजः पद्मगदी शङ्खचक्री च पातु वः॥ ९॥
देवो नृसिंहश्चक्राब्जगदी शङ्खी नमामि तम्। अच्युतः श्रीगदी पद्मी चक्री शङ्खी च पातु वः॥ १०॥
बालरूपी शङ्खगदी उपेन्द्रश्चक्रपद्म्यपि। जनार्दनः पद्मचक्री शङ्खधारी गदाधरः॥ ११॥
ज्ञः शङ्खी पद्मचक्री हरिः कौमोदकीधरः। कृष्णः शङ्खी गदी पद्मी चक्री मे भुक्तिमुक्तिदः॥ १२॥
आदिमूर्तिर्वासुदेवस्तस्मात्कर्षणोऽभवत्। संकर्षणाच्च प्रद्युम्नः प्रद्युम्नादनिरुद्धकः॥ १३॥
केशवादिप्रभेदेन एकैकः स्यात्त्रिधा क्रमात्॥ १४॥
द्वादशाक्षरकं स्तोत्रं चतुर्विंशतिमूर्तिमत्। यः पठेच्छृणुयाद्वाऽपि निर्मलः सर्वमाप्नुयात्॥ १५॥