अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 878 में से
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धारण करते हैं। हनुमान्जीके हाथमें वज्र है। उन्होंने अपने दोनों पैरोंसे एक असुरको दबा रखा है। किंनर-मूर्तियाँ हाथमें वीणा लिये हों और विद्याधर माला धारण किये आकाशमें स्थित दिखाये जायें। पिशाचोंके शरीर दुर्बल-कङ्गालमात्र हों। वेतालोंके मुख विकराल हों। क्षेत्रपाल शूलधारी बनाये जायें। प्रेतोंके पेट लंबे और शरीर कृश हों॥ १६-१८॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'सूर्यादि ग्रहों तथा दिक्पालादि देवताओंकी प्रतिमाओंके लक्षणोंका वर्णन' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५१ ॥
बावनवाँ अध्याय
चौंसठ योगिनी आदिकी प्रतिमाओंके लक्षण
श्रीभगवान् बोले— ब्रह्मन् ! अब मैं चौंसठ योगिनियोंका वर्णन करूँगा। इनका स्थान क्रमशः पूर्वदिशासे लेकर ईशानपर्यन्त है। इनके नाम इस प्रकार हैं— १. अक्षोभ्या, २. रूक्षकणीं, ३. राक्षसी, ४. क्षपणा, ५. क्षमा, ६. पिङ्गाक्षी, ७. अक्षया, ८. क्षेमा, ९. इला, १०. नीलालया, ११. लोला, १२. रक्ता (या लक्ता), १३. बलाकेशी, १४. लालसा, १५. विमला, १६. दुर्गा (अथवा हुताशा), १७. विशालाक्षी, १८. ह्रींकारा (या हुंकारा), १९. वडवामुखी, २०. महाक्रूरा, २१. क्रोधना, २२. भयंकरी, २३. महानाना, २४. सर्वज्ञा, २५. तरला, २६. तारा, २७. ऋग्व़ेदा, २८. हयानना, २९. सारा, ३०. रससंग्राही (अथवा सुसंग्राही या रुद्रसंग्राही), ३१. शबरा (या शाम्बरा), ३२. तालजङ्घिका, ३३. रक्ताक्षी, ३४. सुप्रसिद्धा, ३५. विद्युज्जिह्वा, ३६. करङ्किणी, ३७. मेघनादा, ३८. प्रचण्डा, ३९. उग्रा, ४०. कालकर्णी, ४१. वरप्रदा, ४२. चण्डा (अथवा चन्द्रा), ४३. चण्डवती (या चन्द्रावली), ४४. प्रपञ्चा, ४५. प्रलयान्तिका, ४६. शिशुवक्त्रा, ४७. पिशाची, ४८. पिशितास्रवलोलुपा, ४९. धमनी, ५०. तपनी, ५१. रागिणी (अथवा वामनी), ५२. विकृतानना, ५३. वायुवेगा, ५४. बृहत्कुक्षि, ५५. विकृता, ५६. विश्वरूपिका, ५७. यमजिह्वा, ५८. जयन्ती, ५९. दुर्जया, ६०. जयन्तिका (अथवा यमान्तिका), ६१. विडाली, ६२. रेवती, ६३. पूतना तथा ६४. विजयान्तिका॥ १-८॥
योगिनियाँ आठ अथवा चार हाथोंसे युक्त होती हैं। इच्छानुसार शस्त्र धारण करती हैं तथा उपासकोंको सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करनेवाली हैं। भैरवके बारह हाथ हैं। उनके मुखमें ऊँचे दाँत हैं तथा वे सिरपर जटा एवं चन्द्रमा धारण करते हैं। उन्होंने एक ओरके पाँच हाथोंमें क्रमशः खड्ग, अंकुश, कुठार, बाण तथा जगत्को अभय प्रदान करनेवाली मुद्रा धारण कर रखी है। उनके दूसरी ओरके पाँच हाथ धनुष, त्रिशूल, खट्वाङ्ग, पाशकाङ्क एवं वरकी मुद्रासे सुशोभित हैं। शेष दो हाथोंमें उन्होंने गजचर्म ले रखा है। हाथीका चमड़ा ही उनका वस्त्र है और वे सर्पमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। प्रेतपर आसन लगाये मातृकाओंके मध्यभागमें विराजमान हैं। इस रूपमें उनकी प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करनी चाहिये। भैरवके एक या पाँच मुख बनाने चाहिये॥ ९-११॥
पूर्व दिशासे लेकर अग्निकोणतक विलोम-क्रमसे प्रत्येक दिशामें भैरवको स्थापित करके क्रमशः उनका पूजन करे। बीज-मन्त्रको आठ दीर्घ स्वरोंमेंसे एक-एकके द्वारा भेदित एवं अनुस्वारयुक्त करके उस-उस दिशाके भैरवके साथ संयुक्त करे और उन सबके अन्तमें 'नमः' पदको जोड़े। यथा—ॐ ह्रां भैरवाय नमः—प्राच्याम्। ॐ ह्रीं भैरवाय नमः—ऐशान्याम्।