अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 133, कुल 878 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
क्रमसे अलग-अलग रखे। इनमें पहला भाग ब्रह्माका, दूसरा विष्णुका और तीसरा शिवका है। उन भागोंमें यह 'वर्द्धमान' भाग कहा जाता है। चौकोर मण्डलमें कोणसूत्रके आधे मापको लेकर उसे सभी कोणोंमें चिह्नित करे। ऐसा करनेसे आठ कोणोंका 'वैष्णवभाग' सिद्ध होता है, इसमें संशय नहीं है। तदनन्तर उसे षोडश कोण और फिर बत्तीस कोणोंसे युक्त करे॥१-४॥
तत्पश्चात् चौंसठ कोणोंसे युक्त करके वहाँ गोल रेखा बनावे। तदनन्तर श्रेष्ठ आचार्य लिङ्गके शिरोभागका कर्तन करे। इसके बाद लिङ्गके विस्तारको आठ भागोंमें विभाजित करे। फिर उनमेंसे एक भागके चौथे अंशको छोड़ देनेपर छत्राकार सिरका निर्माण होता है। जिसकी लंबाई-चौड़ाई तीन भागोंमें समान हो, वह समभागवाला लिङ्ग सम्पूर्ण मनोवाञ्छित फलोंको देनेवाला है। देवपूजित लिङ्गमें लंबाईके चौथे भागसे विष्कम्भ बनता है। अब तुम सभी लिङ्गोंके लक्षण सुनो॥५-८॥
विद्वान् पुरुष सोलह अङ्गुलवाले लिङ्गके मध्यवर्ती सूत्रको, जो ब्रह्म और रुद्रभागके निकटस्थ है, लेकर उसे छः भागोंमें विभाजित करे। वैयमन-सूत्रोंद्वारा निश्चित जो वह माप है, उसे 'अन्तर' कहते हैं। जो सबसे उत्तरवर्ती लिङ्ग है, उसे आठ जौ बड़ा बनाना चाहिये; शेष लिङ्गोंको एक-एक जौ छोटा कर देना चाहिये। उपर्युक्त लिङ्गके निचले भागको तीन हिस्सोंमें विभक्त करके ऊपरके एक भागको छोड़ दे। शेष दो भागोंको आठ हिस्सोंमें विभक्त करके ऊपरके तीन भागोंको त्याग दे। पाँचवें भागके ऊपरसे घूमती हुई एक लंबी रेखा बनावे और एक भागको छोड़कर बीचमें उन दो रेखाओंका संगम करावे। यह लिङ्गोंका साधारण लक्षण बताया गया; अब पिण्डकाका सर्वसाधारण लक्षण बताता हूँ, मुझसे सुनो॥९-१३॥
ब्रह्मभागमें प्रवेश तथा लिङ्गकी ऊँचाई जानकर विद्वान् पुरुष ब्रह्मशिलाकी स्थापना करे और उस शिलाके ऊपर ही उत्तम रीतिसे कर्मका सम्पादन करे। पिण्डिकाकी ऊँचाईको जानकर उसका विभाजन करे। दो भागकी ऊँचाईको पीठ समझे। चौड़ाईमें वह लिङ्गके समान ही हो। पीठके मध्यभागमें खात (गड्ढा) करके उसे तीन भागोंमें विभाजित करे। अपने मानके आधे त्रिभागसे 'बाहुल्य' की कल्पना करे। बाहुल्यके तृतीय भागसे मेखला बनावे और मेखलाके ही तुल्य खात (गड्ढा) तैयार करे। उसे क्रमशः निम्न (नीचे झुका हुआ) रखे। मेखलाके सोलहवें अंशसे खात निर्माण करे और उसीके मापके अनुसार उस पीठकी ऊँचाई, जिसे 'विकाराङ्ग' कहते हैं, करावे। प्रस्तरका एक भाग भूमिमें प्रविष्ट हो, एक भागसे पिण्डका बने, तीन भागोंसे कण्ठका निर्माण कराया जाय और एक भागसे पट्टिका बनायी जाय॥१४-१९॥
दो भागसे ऊपरका पट्ट बने; एक भागसे शेष-पट्टिका तैयार करायी जाय। कण्ठपर्यन्त एक-एक भाग प्रविष्ट हो। तत्पश्चात् पुनः एक भागसे निर्गम (जल निकलनेका मार्ग) बनाया जाय। यह शेष-पट्टिकातक रहे। प्रणाल (नाली)-के तृतीय भागसे निर्गम बनना चाहिये। तृतीय भागके मूलमें अङ्गुलिके अग्रभागके बराबर विस्तृत खात बनावे, जो तृतीय भागसे आधे विस्तारका हो। वह खात उत्तरकी ओर जाय। यह पिण्डिकासहित साधारण लिङ्गका वर्णन किया गया॥२०-२३॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'लिङ्ग आदिके लक्षणका वर्णन' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥५३॥