भारतकोश
अग्नि पुराण

अग्नि पुराण

Agni Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished878 पृष्ठ

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पृष्ठ 151

१२४ * अग्निपुराण * 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

यात्रा-सम्बन्धी उत्सव तथा वार्षिक आदि उत्सवकी भी योजना करके और उन उत्सवोंका दर्शनकर श्रीहरिको अपने संनिहित जानना चाहिये। भगवान्‌को नमस्कार, स्तोत्र आदिके द्वारा उनकी स्तुति तथा उनके अष्टाक्षर आदि मन्त्रका जप करते समय भी भगवान्‌को अपने निकट उपस्थित जानना चाहिये॥ २५—२९॥

तदनन्तर आचार्य मन्दिरसे निकलकर द्वारवर्ती द्वारपाल चण्ड और प्रचण्डका पूजन करे। फिर मण्डपमें आकर गरुड़की स्थापना एवं पूजा करे। प्रत्येक दिशामें दिक्पालों तथा अन्य देवताओंका स्थापन-पूजन करके गुरु विष्वक्सेनकी स्थापना तथा शङ्ख, चक्र आदिकी पूजा करे। सम्पूर्ण पार्षदों और भूतोंको बलि अर्पित करे। आचार्यको दक्षिणारूपसे ग्राम, वस्त्र एवं सुवर्ण आदिका दान दे। यज्ञोपयोगी द्रव्य आदि आचार्यको अर्पित करे। आचार्यसे आधी दक्षिणा ऋत्विजोंको दे। इसके बाद अन्य ब्राह्मणोंको भी दक्षिणा दे और भोजन करावे। वहाँ आनेवाले किसी भी ब्राह्मणको रोके नहीं, सबका सत्कार करे। तदनन्तर गुरु यजमानको फल दे॥ ३०—३४॥

भगवद्विग्रहकी स्थापना करनेवाला पुरुष अपने साथ सम्पूर्ण कुलको भगवान् विष्णुके समीप ले जाता है। सभी देवताओंके लिये यह साधारण विधि है; किंतु उनके मूल-मन्त्र पृथक्-पृथक् होते हैं। शेष सब कार्य समान हैं॥ ३५-३६॥

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'वासुदेव आदि देवताओंकी स्थापनाके सामान्य विधानका वर्णन' नामक साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६०॥


इकसठवाँ अध्याय

अवभृथस्नान, द्वारप्रतिष्ठा और ध्वजारोपण आदिकी विधिका वर्णन

श्रीभगवान् हयग्रीव कहते हैं— ब्रह्मन्! अब मैं अवभृथस्नानका वर्णन करता हूँ। 'विष्णोर्नु कं* वीर्याणि०' इत्यादि मन्त्रसे हवन करे। इक्यासी पदवाले वास्तुमण्डलमें कलश स्थापित करके उनके जलसे श्रीहरिको स्नान करावे। स्नानके पश्चात् गन्ध, पुष्प आदिसे भगवान्‌की पूजा करे और बलि अर्पित करके गुरुका पूजन करे। अब मैं द्वारप्रतिष्ठाका वर्णन करूँगा। गुरु द्वारके निम्नभागमें सुवर्ण रखे और आठ कलशोंके साथ वहाँ दो गूलरकी शाखाओंको स्थापित करे। फिर गन्ध आदि उपचारों और वैदिक आदि मन्त्रोंसे सम्यक् पूजन करके कुण्डोंमें स्थापित अग्निमें समिधा, घी और तिल आदिकी आहुति दे। तत्पश्चात् शय्या आदिका दान देकर नीचे आधारशक्तिकी स्थापना करे॥ १-४॥

दोनों शाखाओंके मूलभागमें चण्ड और प्रचण्ड नामक देवताओंकी स्थापना करे। उदुम्बर-शाखाओंके ऊपरी भागमें देववृन्दपूजित लक्ष्मीदेवीकी स्थापना करके श्रीसूक्तसे उनका यथोचित पूजन करे। तत्पश्चात् ब्रह्माजीका पूजन करके आचार्य आदिको श्रीफल (नारियल) आदिकी दक्षिणा दे। प्रतिष्ठा-द्वारा सिद्ध द्वारपर आचार्य श्रीहरिकी स्थापना करे। मन्दिरकी प्रतिष्ठा 'हृत्प्रतिष्ठा०' इत्यादि मन्त्रसे की जाती है। उसका वर्णन सुनो। वेदीके पहले गर्भगृहके शिरोभागमें, जहाँ शुकनासाकी समाप्ति होती है, उस स्थानपर सोने अथवा चाँदीके बने हुए श्वेत निर्मल कलशकी स्थापना करे। उसमें आठ प्रकारके रत्न, ओषधि, धातु, बीज और लोह (सुवर्ण) छोड़ दे। उस सुन्दर कलशके कण्ठभागमें वस्त्र लपेटकर उसमें जल


* विष्णोर्नु कं वीर्याणि प्रवोचं यः पार्थिवानि विममे रजांसि। यो अस्कभायदुत्तरꣳ सधस्थं विचक्रमाणास्रेधोरुगायो विष्णवे त्वा॥ (यजु० ५। १८)