अग्नि पुराण
Agni Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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हो और उसके मध्यभागमें भगवान् नृसिंह अथवा गरुडकी मूर्ति हो। ध्वज-दण्ड टूटा-फूटा या छेदवाला न हो। प्रासादकी जो चौड़ाई है, उसीको दण्डकी लंबाईका मान कहा गया है। अथवा शिखरके आधे या एक तिहाई भागसे उसकी लंबाईका अनुमान करना चाहिये। अथवा द्वारकी लंबाईसे दुगुना बड़ा दण्ड बनाना चाहिये। उस ध्वज-दण्डको देवमन्दिरपर ईशान या वायव्यकोणकी ओर स्थापित करना चाहिये॥ २६—३२॥
उसकी पताका रेशमी आदि वस्त्रोंसे विचित्र शोभायुक्त बनावे। अथवा उसे एक रंगकी ही बनावे। यदि उसे घण्टा, चँवर अथवा छोटी-छोटी घंटियोंसे विभूषित करे तो वह पापोंका नाश करनेवाली होती है। दण्डके अग्रभागसे लेकर भूमितक लंबा जो एक वस्त्र है, उसे 'महाध्वज' कहा गया है। वह सम्पूर्ण मनोरथोंको देनेवाला है। जो उससे एक चौथाई छोटा हो, वह ध्वज पूजित होनेपर सर्वमनोरथोंका पूरक होता है। ध्वजके आधे मानवाले वस्त्रसे बने हुए झंडेको 'पताका' कहते हैं अथवा पताकाका कोई माप नहीं होता। ध्वजका विस्तार बीस अङ्गुलके बराबर होना चाहिये। चक्र, दण्ड और ध्वज—इन सबका अधिवासनकी विधिसे देवताकी ही भाँति सकलीकरण करके मण्डप-स्नान (मण्डपमें नहलानेकी क्रिया) आदि सब कार्य करे। 'नेत्रोन्मीलन'को छोड़कर पूर्वोक्त सब कर्मोंका अनुष्ठान करे। आचार्यको चाहिये कि वह इन सबको विधिवत् शय्यापर स्थापित करके इनका अधिवासन करे॥ ३३—३७॥
तदनन्तर विद्वान् पुरुष 'सहस्रशीर्षा०' (यजु० अ० ३१) इत्यादि सूक्तका ध्वजाङ्कित चक्रमें न्यास करे तथा सुदर्शन-मन्त्र एवं 'मनस्तत्त्व'का न्यास करे। यह 'मन' रूपसे उस चक्रका ही 'सजीवीकरण' कहा गया है। सुरश्रेष्ठ! बारह अरोंमें क्रमशः केशव आदि मूर्तियोंका न्यास करना चाहिये। गुरु चक्रकी नाभि, कमल एवं प्रतिनेमियोंमें तत्त्वोंका न्यास करे। कमलमें नृसिंह अथवा विश्वरूपका निवेश करे। दण्डमें जीवसहित सम्पूर्ण सूत्रात्माका न्यास करे। ध्वजमें श्रीहरिका ध्यान करते हुए निष्कल परमात्माका निवेश करे। उनकी बलाबलारूपा व्यापिनी शक्तिका ध्वजके रूपमें ध्यान करे। मण्डपमें उसकी स्थापना और पूजा करके कुण्डोंमें हवन करे। कलशमें सोनेका टुकड़ा और पञ्चरत्न डालकर अस्त्र-मन्त्रसे चक्रकी स्थापना करे। तदनन्तर स्वर्णचक्रको नीचेसे पारेद्वारा सम्प्लावित करके नेत्रपटसे आच्छादित करे। तदनन्तर चक्रका निवेश करे और उसके भीतर श्रीहरिका स्मरण करे॥ ३८—४४॥
'ॐ क्षौं नृसिंहाय नमः।'—इस मन्त्रसे श्रीहरिकी स्थापना और पूजा करे। तदनन्तर बन्धु-बान्धवोंसहित यजमान ध्वज लेकर दही-भातसे युक्त पात्रमें ध्वजका अग्रभाग डाले। आदिमें (ॐ) और अन्तमें 'फट्' लगाकर 'ॐ फट्' इस मन्त्रसे ध्वजका पूजन करे। तत्पश्चात् उस पात्रको सिरपर रखकर नारायणका बारंबार स्मरण करते हुए वाद्योंकी ध्वनि और मङ्गलपाठके साथ परिक्रमा करे। तदनन्तर अष्टाक्षर-मन्त्रसे ध्वजदण्डकी स्थापना करे। विद्वान् पुरुष 'मुञ्चामि त्वा' (ऋक्० १०। १६१। १) इस सूक्तके द्वारा ध्वजको फहरावे। द्विजको चाहिये कि वह आचार्यको पात्र, ध्वज और हाथी आदि दान करे। यह ध्वजारोपणकी साधारण विधि बतायी गयी है॥ ४५—४९॥
जिस देवताका जो चिह्न है, उससे युक्त ध्वजको उसी देवताके मन्त्रसे स्थिरतापूर्वक स्थापित करे। मनुष्य ध्वज-दानके पुण्यसे स्वर्गलोकमें जाता है तथा वह पृथ्वीपर बलवान् राजा होता है॥ ५०॥
इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'अवभृथस्नान, द्वारप्रतिष्ठा और ध्वजारोपण आदिकी विधिका वर्णन' नामक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६१॥